Wednesday, January 31, 2018



जब महबूब करे बेवफाई का गुनाह

जीवन में कब क्या हो जाय इसका अंदाजा लगा पाना सहज नहीं होता यह कथा एक युवती की मोहब्बत और उसके प्रेमी की बेवफाई की दास्तान है। उसने मोहब्बत की और प्रेमी पर अपना मन और तन लुटा दिया मगर प्रेमी की बेवफाई पर जब उसकी मोहब्बत नफरत में बदली तो उसने प्रेमी को.......

सुनीता बेहद खूबसूरत युवती थी, इतनी खूबसूरत कि उसे देखने वाला हर शख्स पहली ही नजर में उस पर फिदा हो उठता था। गली मोहल्ले का हर युवक उसके आगे प्रेम प्रदर्शन करने को बेकरार था। सुनीता का पूरा नाम सुनीता दत्ता था, वह गोरखपुर कोतवाली क्षेत्र में एक कालोनी में किराए पर रह रही थी। यहां रहकर वह पीजी की पढ़ाई कर रही थी। वैसे वह रहने वाली दूर दराज के किसी गांव की थी। उसके पिता रतन कुमार एक किसान थे। जबकि मां गांव की प्रधान हैं। घर की आर्थिक स्थिति साधारण है मगर कोई कमी उनके परिवार में नहीं है। सुनीता उन दोनों की इकलौती औलाद थी जिसे वह अपने पलकों पर बैठाये रहते थे।
बहरहाल जहां वह रह रही थी वहां शायद ही कोई ऐसा युवक हो, जिस पर उसकी खूबसूरती का जादू चला हो, शायद ही कोई ऐसा हो जो उससे दोस्ती करने को लालायित हो। मगर सुनीता को तो जैसे उन मनचले युवकों के बारे में सोचने तक की फुर्सत नहीं थी, वह तो बस अपने आप में ही मग्न रहने वाली युवती थी, अलबत्ता अपनी खूबसूरती पर उसे नाज था, वह जानती थी कि वह बेहद खूबसूरत है इतनी खूबसूरत कि जिस युवक की तरफ नजर भरकर देख ले, वही उसका दीवाना हो जाये। मगर अभी तक उसे कोई युवक पसंद नहीं आया था, वह अपने सपनों के राजकुमार के इंतजार में पलवेंफ बिछाए बैठी थी। ऊपर से वह अपनी पढ़ाई में इतना व्यस्त थी कि इन सब फालतू बातों के बारे में सोचने की उसके पास फुर्सत ही नहीं थी। वह तो बस अपने आप में जिए जा रही थी। अगर अपने परिजनों के बाद उसे किसी से प्यार था तो वह थी किताबें। मगर ऐसा कब तक चलता कभी ना कभी तो उसकी जिन्दगी में बदलाव आना ही था।
करीब दो वर्ष पहले उसकी मुलाकात अनिल कुमार से हुई थी। अनिल कुंवारा था और टेलीफोन विभाग में कार्यरत था। सुनीता की उससे पहली मुलाकात दफ्तर में ही हुई थी, जहां वह नया कनैक्सन अप्लाई करने गई थी। पहली ही नजर में सुनीता उसे दिल दे बैठी। उधर अनिल भी उसे देखते ही उसपर फिदा हो चुका था। उस पहली मुलाकात में दोनों के बीच कोई संवाद शुरू नहीं हो सका, मगर सुनीता वहां से लौटकर भी अनिल को बिसार नहीं पाई थी।
 उस रात वह अनिल के बारे में ही सोचती रही थी। अगले रोज जब वह अपने कालेज पहुंची तो वहां भी उसने अपनी एक खास दोस्त रीना से उस युवक का जिक्र किया। रीना यह सुनकर हैरान रह गई कि लड़कों से दूर भागने वाली सुनीता को कोई लड़का पसंद गया है वह उत्सुकतावश बोली, ”नाम क्या है उसका?“
मालूम नहीं।
एड्रेस पूछा था।
नहीं यार तू तो क्लास लेने लगी मेरी।
अरे फिर क्या बात हुई तुम दोनों  के बीच?“
बात कहां हुई यार बस देख भर लिया एक दूसरे को इसके बाद मैं वापस लौट आई।
और तू कहती है कि उससे तुझे मोहब्बत हो गई है।
हां यार कितनी बार कहूं।
तू पागल हो गयी है।
बताने के लिए थैंक्स
अरे मेरी लाडो कम से कम उसका नाम-पता तो पूछ लिया होगा, या कोई कांटेक्ट नम्बर ही ले लिया होता, अब कहां ढूंढती फिरेगी उसे?“
अब क्या तूने मुझे सचमुच पागल समझ लिया है।
साफ साफ बोल ना।
उसे ढ़ूढने की जरूरत नहीं पड़ेगी
क्यों?“
सोच क्यों?“
अरे क्या पहेलियां बुझा रही है?“
ढूंढने की क्या जरूरत है वह टेलिफोन विभाग में है नौकरी छोड़कर थोड़े ही भाग जाएगा।
इसलिए निश्चिंत है।
ठीक समझा
तू उसे फोन करेगी?“
नहीं
क्यों
क्योंकि मेरा नया नम्बर वही तो लगवायेगा। जाहिर है उस हालत में मेरे नये टेलिफोन का नम्बर भी तो उसके पास होगा अगर उसके दिल में भी कुछ होगा तो मुझे फोन जरूर करेगा वरना तू कौन मैं खामखाह।
फिर तो बेटा तू गई काम से तेरा तो अब भगवान ही मालिक है।जवाब में सुनीता खिलखिलाकर हंस पड़ी।
अरे जब प्यार है तो बोल दे
उसने इंकार कर दिया तो इंसल्ट हो जाएगी
तू इतनी हसीन है कि तुझे तो कोई फिल्मी हीरो भी ना नहीं कर सकता
तारीफ के लिए थैंक्स मगर मैं फोन नहीं करने वाली।
उस दिन तो बात आई-गई हो गयी, मगर सुनीता अनिल को अपने दिल से नहीं निकाल सकी, वह सोते-जागते, उठते-बैठते अनिल के ख्यालों में गुम रहने लगी। घर से बाहर निकलती तो उसकी निगाहें इधर-उधर अनिल को तलाशती रहतीं। अनिल से हुई उस पहली मुलाकात के बाद से वह खोई-खोई सी, उदास सी रहने लगी थी, अब उसे बेसब्री से इंतजार था। अनिल से अगली मुलाकात होने का ताकि वह अपना हाले दिल बयान कर पाती, इसी मुलाकात के इंतजार में दिन पर दिन बीतते चले गये। उसके घर में फोन लग गया मगर लगाने कोई और आया था। फिर उसने सोचा क्या पता वह उसे फोन ही कर ले। इस इंतजार में जब फोन की घंटी बजती तो वह लपक कर चोगा उठाती मगर अनिल का फोन नहीं आया।
पहली मुलाकात के करीब दो सप्ताह बाद, एक दिन उसी मार्केट में उसे अनिल दिखाई दे गया, अनिल को देखते ही उसके दिल के तार झनझना उठे, चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई, उसका दिल हुआ दौड़कर अनिल के सीने से लग जाये, उसे कसकर अपनी बांहों में भींच ले, मगर नारी सुलभ लज्जावश वह ऐसा नहीं कर सकी। अब तक अनिल की भी निगाह उस पर पड़ चुकी थी। वह धड़कते दिल से बस सुनीता को ही घूरे जा रहा था।
कुछ पलों तक यह घूरने का सिलसिला चलता रहा, फिर अनिल सुनीता के पास आया और बेहद मीठे लहजे में झिझकता हुआ बोला, ”माफ कीजिए क्या मैं आपसे दो-चार बातें कर सकता हूं?“
जी हां कीजिए, क्या बात करना चाहते हैं?“
सामने रेस्टोरेंट में चलकर एक-एक कप काॅफी पीते हैं वहीं बातें भी हो जाएंगी।
अच्छा आइडिया है चलिए।
दोनों कुछ कदमों की दूरी पर स्थित रेस्टोरेंट में दाखिल हो गये।
उस दिन दोनों ने एक दूसरे के बारे में बहुत कुछ जान लिया। दोनों में दोस्ती हुई तो फोन पर बात करने का सिलसिला शुरू हो गया। सुनीता के मोबाइल पर अनिल केफोन काल्स आने लगे, दोनों कई-कई घंटे बात करते, मगर फिर भी दिल नहीं भरता तो बाहर मुलाकात का वक्त तय कर लेते। लिहाजा मुलाकातों का सिलसिला भी चल निकला। ऐसी ही एक मुलाकात के दौरान अनिल ने सुनीता को बांहों में भरकर उसके होंठों को चूम लिया, ”अब ये दूरियां बर्दाश्त नहीं होती जान। तुमसे एक पल भी अलग रहने को दिल नहीं करता।
मेरा भी कुछ यही हाल है, अब हमें शादी कर लेनी चाहिएसुनीता मुस्कराई।
तुमने तो मेरे दिल की बात छीन ली, बस कुछ पैसे जोड़ लूं फिर तुम्हे सदा सदा के लिए अपना बना लूंगा।
प्रेमी की बात सुनकर सुनीता खुश हो गई।
अगले ही महीने सुनीता का जन्म दिन था। उस रोज सुनीता ने पहली बार अनिल को अपने किराए के कमरे पर बुलाया, जहां वह अपने मां-बाप से दूर रह कर पीजी कर रही थी। खास बात यह रही कि उसने अनिल के सिवाय किसी को भी अपने जन्मदिन पर आमंत्रित नहीं किया। यहां तक कि उसने अपनी खास दोस्त रीना को भी नहीं बुलाया।
 तन्हा कमरे में दो जवां दिल और रोकने-टोकने वाला भी कोई नहीं था, ऐसे में मन भटकते कितनी देर लगती है। फिर अनिल तो खेला-खाया इंसान था। जाने कितनी कलियों का रस चूस चुका था। सुनीता के साथ भी उसने मोहब्बत का यह खेल इसीलिए खेला था, ताकि उसके हसीन जिस्म का रसपान कर सके। वह सुनीता से मिलने के बाद से ही ऐसे किसी मौके की तलाश में था। आज वह मौका उसे हासिल था इस सुअवसर को हाथ से निकलने नहीं देना चाहता था, लिहाजा उसने सुनीता को अपन बांहों में भींचकर प्यार करना शुरू कर दिया। अनिल के हाथों का स्पर्श उसे मदहोश किए दे रहा था और जब उसे लगने लगा कि वह बहक जायेगी तो उसने अनिल को स्वयं से दूर कर देना चाहा, मगर कामयाब नहीं हो सकी, तब फुसफुसाती हुई बोली, ”अनिल प्लीज ये सब ठीक नहीं है।
मुझे रोको मत जानम आज मैं तुम्हारे इस संगमरमरी हुस्न को पूरी तरह पा लेना चाहता हूं।
नहीं अनिल प्लीज यह सब शादी के बाद ही अच्छा लगता है।कहकर सुनीता ने एक बार फिर उसे स्वयं से दूर कर देना चाहा, मगर कामयाब हो सकी, उल्टा अनिल उसकी टाॅप उतारता हुआ बोला, ”शादी तो तुम्हें मुझसे ही करनी है, फिर क्या फर्क पड़ता है।इतना कहकर अनिल ने उसकी जींस भी उतार फेंकी।
उफ! बेशर्म
वो तो पैदाइशी हूं
हटो भी
नहीं हटता
यह पाप है
सब पुराने जमाने की बातें हैं जानम आज तो मामला लिव इन का है।
मगर मैं ऐसा नहीं कर सकती
क्यों?“
डर लगता है
किस बात का?“
सुनों अगर कुछ उल्टा सीधा हो गया तो?“
नहीं होगा और हो गया तो मैं हूं ! प्लीज मुझे अब और मत रोको
सुनीता प्रेमी को नाराज नहीं करना चाहती थी, फिर उसे यकीन था कि अनिल उससे ही शादी करेगा, ऊपर से वह स्वयं भी उत्तेजित हो चुकी थी लिहाजा उसने अपनी मौन स्वीकृति दे दी।
एक बार दोनों के बीच अवैध रिश्ता कायम हुआ तो अनिल अक्सर सुनीता के जिस्म का लुत्फ उठाने लगा। सुनीता भी उसे अपना भावी पति मानते हुए अपना सर्वस्व समर्पित कर देती थी और उस दिन का इंतजार करती, जब दूल्हा बना अनिल उसके दरवाजे पर बारात लेकर आता, वह नहीं जानती थी कि अनिल से शादी के बारे में सोचना सिर्फ एक हसीन स्वप्न है जो नींद खुलते ही बिखर जाना था। अब तक वह सपनों की दुनिया में जीने की अभ्यस्त हो चुकी थी। लिहाजा अक्सर अनिल को लेकर अपने भावी जीवन के सपने बुनती रहती थी।
वक्त यूं ही तेजी से गुजरता गया और दोनों की पहली मुलाकात हुए करीब एक वर्ष बीत गया। इस गुजरे वक्त में जाने कितनी बार अनिल सुनीता के जिस्म का आनंद उठा चुका था और शादी की बात किसी ना किसी बहाने टाल जाता था। सुनीता को उस पर या उसके प्यार पर कोई शक नहीं था, मगर वह उससे शादी करके अपना जहां बसाने के लिए बेकरार थी। वह चाहती थी कि अनिल हामी भर दे तो वह भी अपने मां-बाप से शादी की इजाजत ले ले। मगर अनिल उसे लगातार टाले जा रहा था।
इसकी कई वजह थी, अनिल एक ऐसा भंवरा था जो कली का रस चूस कर उड़ जाने में विश्वास रखता था। जबकि सुनीता तो उसके पीछे ही पड़ गई थी। दूसरी वजह थी अरेंज मैरिज करने से मिलने वाला मोटा दहेज, जबकि सुनीता से शादी की सूरत में उसे फूटी कौड़ी भी मिलने वाली नहीं थी। ऊपर से आजकल उसकी जिन्दगी में श्यामा नाम की एक अन्य लड़की गयी थी जो सुनीता से खूबसूरत तो थी मगर उसकी स्टाइल अनिल के दिल में खलबली मचा जाती थी। नतीजा ये हुआ कि अनिल उससे नजदीकियां बढ़ाने लगा और एक रोज उसे सीसे में उतारने में कामयाब हो गया। फिर क्या था पहले दोस्ती फिर प्यार और उसके बाद बिस्तर पर वह श्यामा के साथ कबड्डी खेलने लगा। दोनों के अवैध रिश्ते निर्बाध गति से चल पड़े।
मगर ऐसा आखिर कब तक चलता, हमेशा यही होता कि सुनीता शादी की बात करती और अनिल टाल जाता, इसी तरह करीब डेढ़ साल गुजर गया, मगर अनिल ने सुनीता से शादी की दिशा मंे कोई कदम नहीं उठाया था। बस झूठे आश्वासनों से उसे बहलाने की कोशिश करता आया था।
मगर अब सुनीता को उसका यह टाल-मटौल वाला रवैया अखरने लगा था, वह चाहती थी कि अनिल उसे कोई निश्चित तारीख बता दे कि फलां तारीख  या फलां साल में वह उससे शादी कर लेगा, जबकि ऐसा अनिल का कोई इरादा नहीं था।
  सुनीता जैसी जाने कितनी उसकी जिन्दगी में आईं और चली गईं। वह क्या सबसे शादी करता फिरता? लिहाजा सुनीता को भी वह सिर्फ इस्तेमाल कर रहा था, तब-तक जब-तक कि उसकी शादी की जिद चरम पर नहीं पहुंच जाती।
उधर सुनीता अब बेहद उदास रहने लगी थी, वह आफिस में भी बैठे-बैठे आंसू बहाने लगती थी, मगर अपना दर्द किसी से बयान नहीं करती थी, कहती भी क्या, क्या बताती वह दूसरों से कि जिसे अपने मन का मीत माना, वह अपना सबकुछ समर्पित कर चुकी थी, वह शादी से दूर भाग रहा थी, नहीं ऐसा भला वह किसी से कैसे कह सकती थी। लिहाजा दिल ही दिल में घुटती रहती, छिप-छिपकर तन्हाई में आंसू बहाती रहती, उसकी सेहत भी निरंतर गिरती जा रही थी।
रीना से जब उसकी निरंतर बदरंग होती यह हालत नहीं देखी गई तो एक दिन जिद करके वह सुनीता को अपने घर ले गई और वहां एकांत कमरे में बैठकर उससे कुरेद-कुरेद कर सारी बातें पूछती चली गई। सुनीता ने भी उसकी हमदर्दी पायी तो मोटे-मोटे आंसुओं के साथ अपना सारा गम उड़ेल कर रख दिया, सुनकर रीना भौंचक्की रह गई, ”कितनी बेवकूफ है तू इतने दिनों से वह तुझे इस्तेमाल किए जा रहा है, तेरे को उसने मौज-मस्ती का साधन समझ रखा है और तुझे इतनी सी बात समझ में नहीं आई, तू अब भी उससे रिश्ता कायम किए हुए है, जूते मार ऐसे आदमी के मुंह पर दुनिया में क्या एक वही लड़का रह गया है?“
मैं उसके बिना नहीं रह सकती।कहकर सुनीता फक-फक कर रो पड़ी।
अरे तो क्या अपनी जिन्दगी बर्बाद कर लेगी तू।
पता नहीं, मैं क्या करूंगी।
मेरी बात सुन उसे भुला दे
उसे भूलना मेरे वश की बात कहां
देख उससे और अच्छे लड़के इस दुनिया में हैं उन्हें ट्राई कर सब गम भूल जायेगी
मैं उसे किसी और का होता नहीं देख सकती
उसने किसी और से शादी कर ली तो
जान ले लूंगी उसकी
अरे पागल हो गयी है अपने को काबू में कर
हां हां मैं पागल हो गई हूं।कहकर वह फूट-फूट कर रो पड़ी।
बात यहां तक भी सीमित होती तो शायद सुनीता बर्दाश्त कर जाती, मगर इसी दौरान उसे खबर मिली कि अनिल का किसी अन्य लड़की के साथ रिश्ता तय हो गया है। अनिल किसी और का हो जायेगा, यह जानकर सुनीता बौखला उठी, उस दिन वह खून के आंसू रोयी थी और आंसूओं की हरेक बूंद के साथ अनिल के लिए उसके मन में तेजाब भरता चला गया। मोहब्बत नफरत में परिवर्तित होती गई। इतिहास गवाह है कि जब-जब मोहब्बत नफरत में बदली है एक तूफान आया है ऐसा भयंकर तूफान जो अपने साथ जाने कितनों की खुशियां उड़ा ले गया। सुनीता ने मन ही मन क्रूरता की सारी सीमाओं का उल्लंघन कर एक भयानक पैफसला कर डाला।
घटना वाली सुबह उसने फोन करके अनिल को अपने घर बुलाया और बातों के दौरान जब अनिल बेड पर लेट गया तो उसने प्यार-स्नेह भरी बातें करते हुए मजाक ही मजाक में उसके दोनों हाथ पलंग से ऊपर की तरफ बांध दिये और दोनों पैरों को नीचे की तरफ बांध दिया, इसके बाद किचन से एक तेज धार वाली छुरी उठा लाई और प्रेमी के गले पर फिराने लगी। अनिल हलाल होते बकरे की तरह डकारा, साथ ही उसके चेहरे पर गहन आश्चर्य के भाव थे, वह तो सुनीता की हरकतों को महज मजाक समझ रहा था उसने तो कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि फूल सी कोमल और मासूम दिखने वाली सुनीता उसके साथ इतनी बर्बरता के साथ पेश सकती है। दर्द की अधिकता से चीखता-चिल्लाता रहा और सुनीता धीरे धीरे उसका गला रेतती रही, पहले अनिल बेहोश हुआ फिर मौत के मुंह में समा गया। सुनीता ने फोन करके पुलिस को बुला लिया। सुनीता की करतूत देखकर पुलिस कर्मी भी भौंचक्के रह गये, अनिल को तत्काल अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां डाक्टर्स ने उसे मृत घोषित कर दिया। सुनीता को अपने किए पर तनिक भी पछतावा नहीं है। यह ओपन एण्ड शट केस था। पुलिस ने अगले रोज उसे अदालत में पेश किया जहां से उसे न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया।
घटना की सूचना पाकर सुनीता के मां बाप भी गये। वे पूरे घटनाक्रम पर आश्चर्यचकित हैं। वे यकीन नहीं कर पा रहे कि उनकी भोली-भाली बेटी किसी का कत्ल भी कर सकती है। बहरहाल वे सुनीता की जमानत के प्रयास में लगे हुए हैं।

समाप्त

Thursday, August 10, 2017



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संतोष पाठक का नया उपन्यास
खतरनाक साजिश
सब-इंस्पेक्टर नरेश चैहान पर इल्जाम था कि उसने दो महिलाओं की बड़े ही बर्बरता पूर्ण ढंग से, गला घोंटकर! ना सिर्फ हत्या की थी, बल्कि हत्या से पहले उन्हें जमकर नोंचा-खसोटा भी था। उसके खिलाफ, सबसे ज्यादा डैमेज करने वाली बात ये थी कि गिरफ्तारी के वक्त वो एक ऐसी यूनीफाॅर्म पहने था जो मरने वाली दोनों महिलाओं के खून से रंगी हुई थी। जबकि पुलिस का दावा था कि उनके पास मुलजिम के खिलाफ सिक्केबंद सबूत थे, लिहाजा उसका जेल जाना महज वक्त की बात थी। ऐसे में सिर्फ एक शख्स था, जिसे पुलिस की राय से इत्तेफाक नहीं हुआ, और वो था फेमस प्राइवेट डिटेक्टिव विक्रांत गोखले।


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खतरनाक साजिश
आप सबूतों को पेश करते वक्त ये भूल गये कि मुलजिम पुलिस डिपार्टमेंट में ना सिर्फ एक काबिल अफसर है बल्कि अपनी दिमागी सूझ-बूझ से जाने कितने कत्ल के केस सुलझा चुका है। ऐसे में भला कैसे उससे उम्मीद की जा सकती है ना सिर्फ उसने दो औरतों की निर्ममता पूर्वक हत्या कर दी, बल्कि हत्या के बाद अपनी खून लगी वर्दी और जूतों से पीछा छुड़ाने की बजाय वो नशे में धुत्त होकर, अपने फ्लैट का दरवाजा खुला छोड़कर सो गया। यानि उसने पुलिस को निमंत्रण दिया था कि आओ मैं ही हत्यारा हूं आकर मुझे गिरफ्तार कर लो। 

विक्रांत गोखले उवाच!साहबान लड़कियों की एक खास आदत होती है। जब तक उन्हें लगता है कि उन्हें कोई भाव नहीं दे रहा तब तक वो सबको भाव देती हैं - अखबार वाले, दूध वाले, कैंटीन वाले, यहां तक कि गोलगप्पे वाले को भी नहीं छोड़तीं - मगर ज्योंहि उन्हें पता लगता है कि कोई उन्हें भाव देने लगा है तो बस वहीं से वो भाव देने की बजाय भाव खाना शुरू कर देती हैं।खतरनाक साजिशशीध्र प्रकाशित

Thursday, July 13, 2017

         कॉलगर्ल का आत्मसम्मान
                                           

रजनी अप्सराओं जैसी खूबसूरत थी, कसावदार सेक्सी बदन, रसभरे होंठ और बड़ी-बड़ी आंखें किसी को भी सहज ही उसका दीवाना बना देती थीं। वह खुद भी तो यही चाहती थी मर्दों की निगाहों में आना! यही तो उसकी कमाई का जरिया था।
रात के दस बजने को हैं, इसका अहसास रजनी को, अभी-अभी घड़ी देखने के पश्चात ही हुआ था। वक्त का अहसास होते ही न जाने क्यों एक अंजाना-सा भय धीरे से उसके दिल में उतर आया और धमनियों में बहते लहू के साथ जा मिला। दस बजना कोई नई बात नहीं है, अक्सर ऐसा हो जाया करता है, फि़र भी आज वह फि़क्रमंद हो उठी है। उसने धीरे-धीरे गर्दन घुमाकर अपने आस-पास का जायजा लिया। बस-स्टॉप तकरीबन खाली हो चुका था, जो बचे हुए लोग दिखाई दिये, उन्हें वह अपनी उंगलियों पर गिन सकती थी।
जैसे कि---मूंगफ़ली वाला, जलेबी वाला, पान वाला और उसके आजू-बाजू खड़े दो मर्द। कुल पांच लोग मौजूद हैं, वहां जिनके होने का उसके लिए कोई महत्व नहीं था। उन सबके बीच रहकर भी वह नितांत अकेली ही है। ऊपर से जानबूझकर सबसे अलग-थलग बने रहने की मुसीबत लड़की जो ठहरी।
ऐसे वक्त में स्वयं का लड़की होना उसे किसी भयंकर अपराध से कम नही महसूस होता। फ़ुरसत के क्षणों में वह अक्सर सोचती है, ईश्वर ने उसे लड़की क्यों बनाया, लड़का क्यों नहीं? तब कम से कम हर वक्त उसके भीतर यह असुरक्षा की भावना तो नहीं बनी रहती। बात अगर सिफऱ् इतनी होती तो गनीमत थी, किन्तु यहां तो हर तरफ़ एक के बाद एक मर्द, सर्प की तरह फ़न उठाये, दंश मारने को एकदम से तैयार मिलते हैं। क्या-क्या नहीं बर्दाश्त करना पड़ता है उसे, कहीं अपनी गर्दन पर महसूसती उनकी गर्म सांसों की फ़फ़ुंकार, तो कहीं शरीर पर चुभती उनकी तेज धारदार निगाहें, कपड़ों के भीतर तक एक्सरे करती हुई सी---भला इनसे भी बचा जा सकता है?
अब इन्हीं दो हरामजादों को देखो, आजू-बाजू यूं तन कर खड़े हैं, जैसे दोनों उसके ‘बॉडीगार्ड’ हों। ऊपर से धीरे-धीरे अपनी तरफ़ फि़सलती उनकी टांगों का अहसास! वह बेखबर नहीं है, सब कुछ समझ रही है वह, रग-रग से वाकिफ़ है वह इन पुरुषों की, जो मन ही मन उसे हजम कर जाना चाहते हैं---या फि़र कर भी चुके और जता यूं रहे हैं जैसे कोई मतलब ही नहीं हाें उससे। मानो सब-कुछ अनजाने में ही होता चला जा रहा है। ये लोग मांस खाना तो चाहते हैं, किन्तु हड्डियों को गले में लटकाकर घूमने की कुव्वत उनमें नहीं है। वे नहीं चाहते की कोई उन्हें मांसाहारी समझे, रजनी उन दोनों से ही दूर हो जाना चाहती है, किन्तु क्या करें, एकांत का सामना करने की हिम्मत उसमें नहीं है बस, कभी-कभार जब उन दोनों का सामीप्य बर्दाश्त से बाहर होने लगता है, तो आगे-पीछे सरक कर स्वयं को उनसे दूर रखने की कोशिश भर कर लेती है।
किन्तु सब व्यर्थ साबित हो रहा है, अगले ही पल दोनों ने पुनः अपने स्थान से सरकना शुरू कर दिया और उसके एकदम करीब पहुंच गये। रजनी ने निगाहों से ऐतराज जताने की कोशिश की। बारी-बारी से उन दोनों को घूरकर देखा। एक पल को दोनों उधर से अपनी निगाहें फ़ेरकर तनिक सिमट से गये, किंतु उसकी निगाह हटते ही फ़नः पुराना सिलसिला चल निकला। गुजरते वक्त के साथ रजनी की परेशानी बढ़ने लगी, वह कुछ अधिक नर्वस हो उठी। घड़ी देखने पर ज्ञात हुआ कि साढ़े दस बज चुके हैं। वह अपनी जगह से हटकर तनिक आगे बढ़ी दूर-दूर तक सड़क पर निगाह दौड़ाकर देखने की कोशिश की, निराशा ही हाथ लगी, बस का कहीं पता नहीं था। पिछले एक घंटे से यहां खड़ी वह अपनी बस का इंतजार कर रही है, ऑटो से भी जा सकती है, किन्तु बस के साथ-साथ मानो ऑटो वालों  ने भी हड़ताल कर दिया हो, वह कर भी क्या सकती है? बस इंतजार किये जा रही है।
ऐसे वक्त में अचानक बज उठे मोबाइल फ़ोन की घंटी सुनकर उसे तनिक राहत-सी महसूस हुई, बैग में हाथ डालकर उसने फ़ोन बाहर निकाला और बातें करने लगी। ‘‘हॉय’’ उधार से कहा गया, ‘‘कहां हो जानेमन, क्या इस दीवाने को मार डालने का इरादा है, जल्दी आओ ना सारा नशा उतरा जा रहा है। मैं बेकरार हूं तुम्हारी तनी हुई पु"ट छातियों को सहलाने के लिए, तुम्हारे भारी कूल्हों को थपथपाने के लिए---।’’ फ़ोनकर्ता इससे पहले की शराब के नशे में कुछ और कहता रजनी ने ‘बस आधा घंटा और’ कहकर काल डिस्कनैक्ट कर दिया। रजनी ने फ़ोन पुनः बैग में रख लिया और इंतजार करने लगी।
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दरियागंज के बस स्टॉप पर रुकने के बाद बस, अभी-अभी आगे बढ़ी थी। अनायास ही रजनी की निगाह खिड़की से बाहर झांकती हुई, अगले दरवाजे तक पहुंच गई। एक नवयुवक बड़ी ही तेज गति से बस के साथ-साथ दौड़ रहा था, मानो यह उसके जीवन की आखिरी बस हो। वह बार-बार बस के भीतर दाखिल होने की कोशिश कर रहा था, एक पल को लगा बस उसके हाथ से छूट चुकी है। किन्तु वह हार मानने को तैयार नहीं था। दौड़ता रहा, दौड़ता रहा और अंततः वह मानो हवा में उड़ता हुआ-सा बस के भीतर दाखिल हो गया।
‘अबे , बहन चो----मरेगा क्या?’
यह खूबसूरत-सा वाक्य निश्चय ही ड्राइवर के मुख से निकला था। मालूम नहीं, वह किस बात पर क्रोधित है, युवक द्वारा बस की स्पीड को धता बताने पर या फि़र वह सचमुच उसके लिए फि़क्रमंद था। गाली देने के पश्चात वह पुनः अपनी ड्राइविंग में खो गया, मुड़कर अपने शब्दबाण का असर तक देखने की कोशिश नहीं की। युवक ने भी जवाब में कुछ नहीं कहा, वह बस की छत में लगे लोहे के डण्डे को पकड़कर झूलता हुआ आगे बढ़ा और रजनी के बगल में धम्म से बैठ गया। इस प्रक्रिया में उसकी कोहनियां रजनी की छातियों को सहला गई, हाथ, उसकी जांघों पर दबाव बना गए। रजनी को तनिक असुविधा-सी महसूस हुई। किन्तु वह मुंह से कुछ नहीं बोली---आदत-सी पड़ गई है उसे इस तरह धक्के खाने की, फि़र सोचती है, अब बचा ही क्या है उसके पास सहेज कर रखने के लिए, वक्त से बहुत पहले ही तो गंवा चुकी है वह अपना सब कुछ---अब तो आत्मसम्मान, सतीत्व इत्यादि के विषय में सोचना भी भारी मजाक का विषय जान पड़ता है। वह यकीन पूर्वक कह सकती है कि उसके बगल में बैठा युवक जान-बूझकर हड़बड़ी जताता हुआ वहां आ बैठा था, वह सिफऱ् उसे स्पर्श करना चाहता था, कर चुका था।
‘ऊंह, हरामजादा---स्साला।‘
युवक ने हड़बड़ाकर उसकी तरफ़ देखा, वह अचम्भित है, यकीन नहीं कर पा रहा है कि उसके बगल में मौजूद इस खूबसूरत रमणी ने उसे गाली दी है।
‘आपने मुझसे कुछ कहा?‘ वह स्वयं को प्रश्न करने से नहीं रोक पाया।
‘जी नहीं।‘ कहकर रजनी ने मुंह फ़ेर लिया और खिड़की से बाहर फ़ैंसी रंग-बिरंगी रोशनियों में स्वयं को उलझाने का प्रयत्न करने लगी, मगर इस दौरान उसका पूरा ध्यान युवक के इर्द-गिर्द ही मंडराता रहां वह चाहकर भी उसके ख्यालों को दिमाग से खुरच नहीं पा रही थी। उसे बार-बार महसूस हो रहा था जैसे वह युवक  उस पर हंस रहा हो और उसकी खामोश निगाहें रजनी के शरीर को टटोलने का प्रयत्न कर रही हो। क्या सचमुच ऐसा ही था, या फि़र यह एक नया भ्रम है। जिसने उसके भीतर का दरवाजा खोज लिया है और अब उस बंद दरवाजे पर दस्तक देने की कोशिश कर रहा है। वह परेशान हो उठी।
अचानक उसे लगा बगल में बैठा युवक उसके खुले गले से झांकते उरोजों को घूर रहा है, वह एकदम से युवक की ओर पलट गई मगर वह दूसरी ओर देख रहा था। अचानक ही उसे अपने चारों तरफ़, माहौल कुछ बदला-बदला-सा प्रतीत होने लगा। भीतर कहीं एक अनजाना-सा अहसास रह-रहकर करवटें बदलने लगा। जाने यह सब क्या है, क्यों हो रहा है? वह जानने की कोशिश करने लगी ढूंढने लगी, उस नयेपन के अहसास को, रास्ते में छिटकी पड़ी चांदनी और लैम्प पोस्ट की रोशनी में। हर जगह, हर तरफ़, किन्तु जो भी दिखाई दिया वह सामान्य ही लगा, बिल्कुल पहले जैसा। उसका दिल इसे स्वीकारने को तैयार नहीं था, कुछ तो होना ही चाहिए---वह जो अब अपना स्वरूप त्याग चुका है, जिसके होने का अहसास उसे अपने चारों तरफ़ फ़ैला हुआ महसूस हो रहा है। रजनी की परेशानी बढ़ने लगी। उसने आगे-पीछे, बस के अन्दर, बस के बाहर हर तरफ़ तलाश करके देख लिया---सबकुछ सामान्य ही दिखाई दिया। फि़र क्यों उसका दिल यूं बार-बार किसी असामान्यता के घेरे में कसता चला जा रहा है?
रजनी इस बारे में जितना अधिक सोच रही है, उतना ही उलझती जा रही थी। उसने एक के बाद दूसरी, तीसरी---कई कोशिशें कर डालीं, खुद को उस असामान्यता के घेरे से बाहर निकालने की, किन्तु सफ़ल नहीं हो सकी। हार मानकर वह शांत बैठ गई, उसने अपने शरीर को ढीला छोड़ दिया। किन्तु मन ज्यों का त्यों भटकता रहा। निगाहों को साथ लिए वह जाने कहां-कहां फि़रता रहा। यूं भटकती उसकी निगाह जब अपने सहयात्री पर पड़ी, तो वह चौंक उठी---उसके बगल में बैठा युवक सीट की दूसरे किनारे की हदों को पार करता हुआ अपने आप में सिमट-सा गया था। मानो रजनी कोई छूत की बीमारी हो, जिसके स्पर्श से वह बचना चाहता है। मानो, वह कोई आम लड़की हो, जिस पर ध्यान देना उसने गैरजरूरी समझा था। आज से पहले उसके साथ कभी ऐसा नहीं हुआ था। क्या बच्चे, क्या जवान और क्या बूढ़े सभी उसका सामीप्य पाने को आकुल दिखाई देते थे, दूर खड़े लोग एक-दूसरे को धकियाते हुए उसके करीब पहुंचने की चेष्टा करते थे और अगर उसके बगल में कोई नवयुवक बैठा हो, फि़र तो हर मोड़ पर रजनी को उसके शरीर का भार झेलना पड़ता था। कभी-कभी तो पीछे मर्द के उत्तेजक अंग की कठोरता वह कपड़ों के ऊपर से ही अपने नितम्बों पर महसूस करती थी मानो यूं खड़े-खड़े पीछे से ही मुफ्त में मजा मार लेना चाहता हो। अब उसे यह सब बुरा नहीं लगता था---वह भीतर तक आनंदित हो उठती थी, श्रेष्ठता के अभिमान में उसका चेहरा जगमगा उठता था, मानो, उसने कोई मैडल जीत लिया हो।
वह थी ही खूबसूरती की हदों को पार करती हुई सी, एक बार जो उसे देख लेता बस---कभी-कभी तो उसे स्वयं भी रश्क हो आता, अनजान नहीं थी वह खुद से। किन्तु आज सब कुछ बदल-सा गया है, उसके बगल में बैठा यह अनजान युवक उसमें तनिक भी दिलचस्पी नहीं ले रहा। रजनी को लगा सारी असामान्यता यहीं है, जो कि बेवजह उसके भीतर कसमसाहट उत्पन्न कर रही थी। उसने चोर निगाहों से युवक की तरफ़ देखा, सूरत से वह निहायती शरीफ़ नजर आया, पढ़ा-लिखा भी मालूम हुआ, फि़र इतनी बेरुखी? रजनी सोच में पड़ गई। क्या सचमुच ऐसा हो सकता है कि वह उससे जरा-भी प्रभावित नहीं हुआ हो। सोचते वक्त अनजाने में ही उसकी निगाह सामने के शीशे पर जा पड़ी और वहीं थमकर रह गई। शीशे में अपना अक्स देखकर वह पहले की भांति फ्रुल्लित नहीं हो सकी, कुछ बुझ-सी गईं उसे लगा यह चेहरा तो उसका है ही नहीं, यह तो कोई अजनबी सूरत है, जो ठीक से पहचानी भी नहीं जाती। देखते ही देखते उसके केश बिखर से गये, गालों पर झुर्रियां उभर आईं और उसकी खूबसूरत बड़ी-बड़ी आंखें अंदर को धंस गई प्रतीत होने लगी, वह भयभीत हो उठी, उसका दिल कर रहा है कि वह चीख-चीखकर सबको बता दे कि यह वो नहीं है, यह चेहरा जो दिखाई दे रहा है, यह उसका नहीं है।
चिल्लाने की कोशिश में वह पसीने से तर हो गई, भयभीत होकर उसने अपनी निगाहें फ़ेर लीं और धीरे-धीरे पुनः अपना ध्यान युवक पर केन्द्रित करने लगी, किन्तु यहां भी उसको सकून नहीं मिल रहा, युवक का बर्ताव बार-बार उसके भीतर चुभन-सी पैदा कर रहा है। रजनी को यह सरासर अपनी तौहीन दिखाई दे रही है, उसका अहम इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहा कि वह युवक उसकी तरफ़ से उदासीन बना बैठा रहे, प्रति पल उसके भीतर की कसमसाहट बढ़ती जा रही है, युवक को झुकाने की कोशिश में वह स्वयं झुकती चली गई। वो युवक से बातें करने को उतावली हो उठी, किसी अजनबी से बात करने में तनिक झिझक तो अवश्य महसूस हुई, किन्तु वह खामोश नहीं रह सकी।
‘एक्सक्यूज मी!‘ उसने हौले से कहा, आवाज गले में फ़ंसती हुई महसूस हुई।
आवाज सुनकर वह रजनी की दिशा में घूम-सा गया, ‘यस प्लीज।‘
‘जी---जी, वो---दरअसल।‘ वह हड़बड़ा-सी गई, क्या कहे, क्या पूछे? अचानक कुछ खास न सूझ सका तो टाईम ही पूछ लिया।
‘पौने ग्यारह!‘ जवाब देकर वह पुनः पहले वाली स्थिति में पहुंच गया। रजनी लाचार हो उठी। धीरे से पहलू बदलकर उसने अपना मुख खिड़की की तरफ़ घुमा लिया और पुनः कोशिश करने लगी, उसी युवक को अपने ख्वाबों से खुरच देने की। किन्तु यह कोशिश हार के करीब पहुंचने पर उत्पन्न हुई, जीत की प्रबल आकांक्षा के समान थी। धीरे-धीरे उसकी कल्पनाशीलता बढ़ने लगी। उसने युवक को अपने भीतर बिठाकर तमाम खिड़की-दरवाजों को मजबूती से बंद कर लिया। फि़र शुरू किया सपने बुनने का एक लम्बा सिलसिला! जिसमें तरह-तरह के सुखद स्वप्न उसके सामने उपस्थित थे, जिन्हें वह मनमाने ढंग से बना-बिगाड़ सकती थी, यहां वह अपनी मर्जी की मालिक है। सपने में वह युवक उसके होंठों को चूम रहा था और वह उसे बार-बार पीछे धकेल देती थी। युवक गिड़गिड़ा रहा था उसके जिस्म को पाने के लिए मिन्नतें कर रहा था और वह उसे दुत्कार रही थी। आखिर युवक ने उसके आगे हाथ जोड़ दिए और गिड़गिड़ाता और बोला, ‘‘ऐ हुस्नपरी मुझे अपने इस खूबसूरत जिस्म का स्वाद चख लेने दे। मुझे अपना गुलाम समझ और अपने हुस्न की सेवा करने का मौका दो।’’
‘‘ठीक है’’ वह किसी महारानी की तरह गर्वांवित स्वर में बोली, ‘‘अगर तू मेरी गुलामी करने को तैयार है तो पहले मेरे खूबसूरत पैरों को अपनी जीभ से चाट फि़र टांगों को चाटता हुआ जांघो तक पहुंच और यूं मेरे अंग प्रत्यंग भीतरी और बाहरी दुनिया को अपनी जुबान से तर-बतर कर और फि़र मेरे जिस्म की गहराइयों में उतर जा।’’
रजनी अपने ख्वाब को लगातार मनमाना रूप दिए जा रही थी, उसका ख्वाब जारी था, युवक उसका हुक्म बजा रहा था। अपने बदन पर फि़रती उसकी जीभ के स्पर्श से रजनी जल्दी ही कामुक सीत्कारें भरने लगी। मारे उत्तेजना के उसने युवक को कसकर अपनी बांहों में भीच लिया---।
तभी बस ने तेज झटका खाया। रजनी का सिर आगे वाली सीट के पुज्त से टकराया और उसका हसीन ख्वाब छिन्न-भिन्न हो गया।
 ख्वाबों के घेरे से बाहर निकलकर वह विनम्र हो उठी---युवक के बारे में उसकी राय तब्दील होने लगी। कुछ समय पूर्व जो निष्ठुरता उसके अहम पर चोट कर रही थी। अब अचानक ही वह भली लगने लगी---रजनी मजबूर हो उठी, फि़र एक नये सिरे से उसके बारे में सोचने लगी, ‘ओह कितना शरीफ़ है, बेचारा! आजकल भला इतने सीधे-सादे लोग मिलते ही कहां हैं, खासतौर से हम लड़कियों के मामले में, सभी की फि़तरत एक होती है। उनका दृष्टिकोण एक होता है, सोचने-समझने का नजरिया एक होता है और उन सबकी हरकतें भी एक जैसी होती हैं, किन्तु यह---यह तो सबसे अलग है, जैसे फ़ुरसत ही नहीं है किसी और के बारे में सोचने की।‘
रजनी जाने कब मुग्ध हो उठी, उसके इस भोलेपन पर।
पहली बार उसके दिल के किसी कोने में झनकार उठी है, पहली बार उसने अपनी संकीर्ण मानसिकता के घेरे से बाहर निकलकर कुछ अलग सोचा है। महसूस किया है उन कोमल अनुभूतियों को जिनसे आज तक वह अनजान ही रही थी। उसका मन युवक की तरफ़ खिंचा-सा जा रहा है। वह उससे ढेरों बातें करना चाहती है, घनिष्ठता बढ़ाना चाहती है। यह मानव मन की एक दुर्बलता ही है---जो चीज हमसे जितना अधिक दूर होती है, उतनी ही आकर्षक दिखाई देती है और हम उसके उतने ही ज्यादा करीब पहुंचने की कोशिश करते हैं।
युवक की उदासीनता भी रजनी को बार-बार अपनी तरफ़ खींच रही है और वह सम्मोहित-सी खिंचती चली जा रही है। वह बार-बार युवक से बातें करने की कोशिश कर रही है और हर बार कुछ कह पाने से पूर्व ही खामोश हो जाती है, किन्तु वह हार मानने को कदापि तैयार नहीं है। एक के बाद एक---ऐसी कई कोशिशों के बाद आखिर वह बोल ही पड़ी।
‘सुनिये।‘
युवक तकाल उसकी दिशा में पलट गया, ‘आपने मुझसे कहा।‘
‘जी हां, दरअसल---मैं, एकच्युली में---आप?‘ वह हड़बड़ाकर चुप हो गई, जो कहना चाहती थी वह बात जुबान पर नहीं आ सकी। स्त्रीओचित लज्जा ने कुछ बोल पाने से पूर्व ही उसे खामोश कर दिया, युवक असमंजस में पड़ गया, किन्तु बोला कुछ नहीं, बस! पहले की भांति ही मुंह फ़ेरकर बैठ गया।
रजनी पुनः तलाशने लगी, कुछ नये किन्तु ऐसे प्रश्न जिनके जरिये वह उस युवक से बातें कर सके, उसके बारे में जान सके, अंदाजा लगा सके, अपनी सोचों के अनुरूप और अभिव्यक्ति कर सके अपने विचारों की, क्या वह युवक से उसका नाम पूछे? ---यह उचित होगा, अगर वह बुरा मान गया तो---शायद नहीं, फि़र इसमें बुरा मानने वाली बात ही क्या है?
‘एक्सक्यूज मी!‘
‘आं---हां---कहिए।‘ वह मानो नींद से जागा हो।
‘क्या, मैं आपको नाम जान सकती हूं?‘
‘जी---आशीष---आशीष कुमार।‘ वह बेहिचक बोला। रजनी की प्रसन्नता का अनुमान न रहा। वह इतरा उठी अपनी विजय पर---इतना ज्यादा कि एक के बाद दूसरा प्रश्न करने में संकोच का अनुभव न हुआ।
‘आप जॉब करते हैं---शायद।‘
‘जी हां, यहीं एक प्राइवेट फ़र्म में एकाउंट मैनेजर हूं, माफ़ कीजिए, किन्तु आपने अपने बारे में कुछ नहीं बताया।‘
‘मैं!‘ वो इठला उठी, ‘रजनी श्रीवास्तव।‘
‘स्टूडेंट हैं आप---।‘
‘जी नहीं।‘
‘तो फि़र जॉब करती होंगी---।‘
‘अब तो शायद वो भी नहीं करती, कुछ देर पूर्व ही न जाने क्यों सब कुछ बदल-सा गया! कल तक जो कुछ भी मेरा अपना था, मेरे जीवन का अवलम्ब था, आज अचानक ही महत्वहीन हो उठा है, यूं महसूस हो रहा है, जैसे मैंने जिन्दगी को पहचानने में बड़ी भूल की है, अब तक तो मैं सिफऱ् खोती ही चली आई हूं, पाया कुछ भी नहीं। बस, समझते की कोशिश में लगी हूं कि इतना सब कुछ यूं पलक झपकते ही केसे घटित हो गया?‘
‘कुछ समझ में आया?‘
‘नहीं, बस! उलझ-सी गई हूं।‘
‘सूरत से तो ऐसी नहीं दिखती आप।‘
‘माफ़ कीजिए आशीष मैं आपका मंतव्य नहीं सझ सकी।‘
‘दरअसल आपको देखकर लगता है, बस इतना ही पर्याप्त है आपके बारे में सब कुछ जान लेने के लिए। किन्तु मेरा अंदाजा गलत था, आप तो बेहद गहरी हैं---कई परतों से मिलकर बनी हैं और हर परत अपने-आप में सम्पूर्णता का अहसास कराती है। आपके पहलू में बैठते वक्त लगा था, आप महज एक खूबसूरत लड़की हैं। आपने बोलना शुरू किया, तो लगा कॉफ़ी वाचाल हैं आपकी बातें सुनकर लगा, आप बेहद दुःखी हैं और अब मैं सोचने को विवश हो गया हूं कि आप कोई लेखिका या 'ाायरा तो नहीं हैं।‘
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रात के बारह बजने को हैं, किन्तु नींद रजनी की आंखों से कोसों दूर है। वह आशीष के साथ बिताये गये एक-एक क्षण, एक-एक बात को, कई-कई बार मन ही मन दोहरा चुकी है और अब उनका विश्लेषण करके अपनी सोचों के अनुरूप नये-नये अर्थ तलाशने की कोशिश कर रही है। ऐसी हर कोशिश उसे आशीष की तरफ़ खींचती चली जा रही है। उसे महसूस हो रहा है कि वह आशीष से मोहब्बत कर बैठी है। ‘मोहब्बत’ एक नई अनुभूति थी उसके लिए। अब तक वह सिफऱ् सेक्स को ही प्रेम समझती आई है, किन्तु आज ऐसा नहीं है---आज प्रेम का एक नया अर्थ, नया रूप उभर कर उसके सामने आ रहा है।
मन के विचार बार-बार करवट बदल रहे हैं, उसी अनुपात में उसके अंतर्मन की उलझन गहराती जा रही है। किसी एक रास्ते को वह पूर्ण नहीं मान पा रही है---लग रहा है कोई भी राह अपने आपमें पूर्ण नहीं हेाती, कहीं न कहीं उसे दूसरे किसी रास्ते में समाहित होना ही पड़ता है, फि़र वे दोनों एकाकार होकर किसी तीसरे रास्ते से जा मिलते हैं। बस, इसी तरह रास्ते बनते चले जाते हैं। वह इनसे अलग हटकर चलना चाहती है, किन्तु किसी नये राह के निर्माण की क्षमता उसमें नहीं है, फि़र! कितना आसान होता है किसी बने-बनाये रास्ते पर नाक की सीध में आगे बढ़ते चले जाना और कितना मुश्किल होता है नई राह का निर्माण---हर कदम पर फि़सल जाने का खतरा, कहीं चट्टानों से टकराने का भय, तो कहीं किसी गहरे अंधड़ में गिर पड़ने की आशंका।
वह जाने क्या-क्या सोचती रही, अंततः अपनी ही भयावह सोचों से भयभीत हो, वह चिल्ला कर उठ बैठी, मानो अभी-अभी नींद से जागी हो, उसे अपना समूचा अस्तित्व सागर की अन्नत गहराइयों में विलीन होता-सा प्रतीत हो रहा है।
ओह! जाने क्या-क्या सोचती रहती वह---पहले भी तो उसने ऐसे ही किसी नये रास्ते के निर्माण की कोशिश की थी, नतीजा क्या हुआ एक बार जो पांव फि़सला तो जीवनभर फि़सलती ही चली गई। लीक से अलग हटकर चलने की कोशिश मे वह परत दर परत के गर्त में समाती चली गई और आज वह महज एक कॉलगर्ल बनकर रह गई है। अपनी स्वेच्छा से ही तो चुना था, उसने यह ‘धंधा’ न कि किसी ने मजबूर किया था, जैसा कि इस दो़ करोड़ की आबादी वाले महानगर में अक्सर होता ही रहता है।
वह करती भी क्या? आठ हजार रुपये की माहवारी पगार में पेट तो शायद भर जाता, किन्तु उसकी ऊंची महत्वाकांक्षाएं, जिनके लिए वह स=ह साल की उम्र की उम्र में भागकर दिल्ली चली आई थी---उनका क्या होता? बस, लोगों को अपने ऊपर आशिक करवाना उसका शगल बन गया और शरीर बेचना रोजगार।
उसे याद है अपना पहला ग्राहक जो उसी फ़र्म में मैनेजर था जहां उसने क्लर्क की नौकरी पकड़ी थी। इस काम का कोई तजुर्बा नहीं था मगर जब उसे अप्वाइंट कर लिया गया तो वह हैरान रह गयी। उसे नौकरी क्यों मिली इसका पता उसे तीसरे रोज चला था जब छुट्टी के समय मैनेजर ने उसे अपने कमरे में बुलाया। सारा स्टाफ़ जा चुका था। मैनेजर ने उठकर उसका स्वागत किया और स्पष्ट लहजे में कहा, ‘‘तुम्हें ये नौकरी इसलिए मिली क्योंकि तुम बहुत हसीन हो। तुम्हारी पगार आठ हजार है पर तुम अगर मुझे खुश कर दो तो पांच हजार का बोनस अभी मैं तुम्हें दूंगा।’’ कहकर मैनेजर ने 500 के दस नोट सामने रख दिए, ‘‘फ़ैसला तुम्हारा है, तुम सिफऱ् नौकरी करना चाहती हो या बोनस भी पाना चाहती हो।’’
रजनी की बोलती बंद हो गई। मगर वह ज्यादा देर तक असमंजस की स्थिति में नहीं रही, उसने सामने पड़़े नोट अपने पर्श में रखे और उठकर स्वयं ही कमरे का दरवाजा भीतर से बंद कर दिया।
मैनेजर की बांछें खिल गई। वह 40 के पेटे में पहुंचा दो बच्चों का बाप था। मगर रजनी पर यूं झपका मानों पहली बार किसी जवान खूबसूरत लड़की को देखा हो उसने कुछ ही पलों में रजनी की सलवार कमीज उतार फ़ेंकी, फि़र उसके ब्रा को नोचकर उसके जिस्म से अलग किया और उसके नग्न बदन को जी भरकर चूमने-चाटने और मसलने के बाद मैनेजर ने अपने अरमानों की तपती सलाख उसकी गहराइयों में उतार दी। रजनी के हलक से चीख निकलते-निकलते बची। वह दांत पर दांत जमाए दर्द बर्दाश्त करती रही और वह उसके कौर्माय को खंडित करता चला गया। कुछ पल बाद मैनेजर कुत्ते की तरह हाफ़ं रहा था और वह दर्द से तड़प रही थी। मगर मैनेजर अपने पैसों की पूरी वसूली चाहता था। थोड़ी देर बाद उसने अपनी मेज की दराज से निकालकर कोई कामवर्धाक कैप्शूल खाया और कुछ ही मिनटों में उसका घोड़ा रेस में दौड़ने को एकदम तैयार था।
रजनी ने जब दोबारा उसे तैयार होते देखा तो सहम सी गई मगर उस वक्त तो वह बिदक ही गई जब मैनेजर ने उसे पीठ के बल लिटाकर सवारी करनी चाही। उसने साफ़ इंकार कर दिया मगर अब तक मैनेजर की कामनाओं का घोड़ा हवा से बातें कर रहा था। उसने रजनी को दो तीन तमाचे जड़े और जबरन उल्टा लिटाकर सवारी करने लगा। रजनी के हलक से एक मर्मातक चीख निकली मगर कमरा साउंड फ्रू था। उसकी चीख कमरे में ही गूंजती रही और मैनेजर ने अपनी मनमानी कर डाली। इससे पूर्व की मैनेजर को वह भला बुरा कहती, मैनेजर ने चुपचाप दो हजार रुपये और उसे पकड़ा दिया।
दो घंटो में सात हजार की कमाई। रजनी सारा दर्द भूल गई। इसके बाद उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज क्या नहीं है उसके पास, सब कुछ तो पा लिया था उसने।
कल तक वह सम्पूर्ण थी, संतुष्ट थी, किन्तु आज अचानक ही सब कुछ खाली-खाली-सा महसूस होने लगा है, आज पहली बार उसे अपनी अंतरआत्मा की आवाज सुनाई पड़ी है, जो उसे बार-बार धिक्कार रही है, उसके चरि= पर लानत भेज रही है। गुजरा हुआ वक्त किसी भयानक ख्वाब की तरह उसे बार-बार उसकी तुच्छता का अहसास करा रहा है। ऊफ़! क्या-क्या करती रही है, वह अब तक, हर रात एक नया मर्द, नई गंध, नया तर्जुबा। वह इतना ज्यादा गिर गई और आज से पहले अहसास तक नहीं हुआ, उसका जी मिचलाने लगा, उठकर बाथरूम की तरफ़ दौड़ी। खाया-पिया सब बाहर, किन्तु तसल्ली नहीं हुई----मुंह में उंगली डालकर जबरन और उल्टियां की, फि़र निर्वस्= होकर ‘शावर’ के नीचे खड़ी हो गई, कोशिश करने लगी, रगड़-रगड़कर स्वयं को साफ़ करने की, इस कोशिश में उसने अपने हर उस अंग को रगड़-रगड़कर घोया जहां से अंजान, अय्याश मर्दों की गंदगी से उठती बू उसे महसूस हो रही थी। मगर जो गंदगी भीतर तक गहरी पैठ बना चुकी थी, वह भला यूं कैसे धुल जाती।
‘हे भगवान---मुझे क्षमा करना।‘ वह हिचक-हिचक कर रोने लगी, जितना रोई, रोने की भावना उतना ही प्रबल होती गई।
इस वक्त उसकी दशा उस जुआरी की भांति हो रही है, जो जुए में अपना सर्वस्व हार चुकने के बाद स्वयं को जी भरकर कोसना शुरू कर देता है। वह भी जाने कब तक खुद को कोसती रही, गालियां देती रही, मन का उद्वेग फि़र  भी शांत नहीं हुआ---बेडरूम में पहुंचकर भीगे बदन ही बिस्तर पर पसर गई। आंखों के समक्ष पुनः आशीष का चेहरा नाच उठा, उससे पुनः मिलने की चाह हर पल बढ़ती जा रही है। इस गहरे अंतर्द्वंद में रात कब बीत गई, कब सवेरा हो गया? यह रजनी नहीं जान सकी।
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बस स्टॉप पर खड़े-खड़े तकरीबन एक घंटा गुजर चुका था, अभी जाने कितना लम्बा खिंचना था यह इंतजार का सिलसिला, किन्तु आज वह मायूस नहीं हो रही, बल्कि उत्सुक है, आशीष से मिलने को। सारी बातें पहले से तय कर चुकी है। एक-एक वाक्य बहुत सोच-समझकर चुना है उसने, बस एक बार वह दिखाई दे जाये---उसकी उत्सुकता हर पल बढ़ती जा रही है, पिछले पांच मिनट में वह दस बार घड़ी देख चुकी है, किन्तु वक्त था कि बीतने का नाम ही नहीं ले रहा। सेकेण्ड की सुई मानो घंटे के हिसाब से चलने लगी हो, एक-एक पल एक-एक युग के समान महसूस हो रहा है।
‘अगर वह नहीं आया तो?‘ सोचने मा= से वह भीतर तक हिल उठी, लगा कोई प्राण खींचे ले जा रहा हो।
‘आयेगा क्यों नहीं?‘ खुद को तसल्ली देने लगी,  ‘बस, तो पकड़नी ही है उसे--अभी तो कल वाला वक्त भी नहीं गुजरा, मैं तो बस---खामखाह परेशान हो रही हूं?‘
यूं ही सिलसिला चलता रहा।
इंतजार करते-करते वह थक-सी गई, कल वाला वक्त भी पीछे छूट गया। मगर वह नहीं आया। गुजरते लम्हों के साथ उसकी उदासी बढ़ने लगी, आशा का स्थान निराशा ने ले लिया। अपने दिल के भीतर बार-बार उसे कुछ चटकता-सा प्रतीत होने लगा, एक-एक करके सारे स्वप्न महल धराशाही होने लगे। फि़र भी अवाक-सी खड़ी वह टकटकी लगाये उसके आने की राह देख रही थी। किन्तु वह नहीं आया। जो कभी उसका था ही नहीं, उसे खोने के गम में रजनी की आंखें छलक आईं---वहीं खड़े-खड़े वह रो पड़ी, जाने कब तक रोती रही।
ध्यान उस वक्त भंग हुआ, जब अचानक ही उसका मोबाइल फ़ोन बज उठा। घंटी की आवाज सुनकर उसके आंसू थम से गये, कुछ क्षण इंतजार करती रही---किन्तु जब घंटी बजनी बंद नहीं हुई तो उसने ‘काल अटैण्ड’ कर ली और बिना कुछ कहे दूसरी तरफ़ से आती आवाज को सुनती रही। इस दौरान उसके चेहरे का तनाव बढ़ने
लगा---आंखें सुलग उठी। कोई कह रहा था, ‘‘अरे रानी कितनी देर लगाओगी, मेरा मन बेकरार हो रहा है।’’
‘सॉरी मैं नहीं आ सकती।‘ वो खुद को जब्त करके बोली।
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‘बकवास मत करो।‘ वह चीख-सी पड़ी, ‘मैं तुम्हारी रखैल नहीं हूं, जो तुम्हारे इशारों पर नाचती फि़रूं।‘
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‘अगर तुम पैसा देते हो तो बदले में जानवरों की तरह रात भर रौंदते हो मुझे।‘
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‘शटअप! आइंदा मुझे फ़ोन मत करना।‘
कहकर उसने ‘कॉल डिस्कनैक्ट’ कर दी। उसका यह फ़ोन भी अद्भुत चीज है---उसका हमसफ़र---उसके हर गुनाह में शरीक कोई नहीं जानता वह कहां रहती है। बस, यह फ़ोन ही था जो दूसरों को उससे जोड़ता था।
फ़ोनकर्ता उसका ‘रेग्यूलर कस्टमर’ था, जो कि गैर-सरकारी बैंक में उच्च अधिकारी था, किन्तु अब उसे किसी की परवाह नहीं है, आज रजनी अपने अतीत से नाता तोड़ आई थी---उधर मुड़कर देखने मा= से उसे दहशत होने लगी है। वह अपने अतीत को भुला देना चाहती थी, जिसके प्रथम प्रयास स्वरूप उसने मोबाइल फ़ोन का बैटरी वाला  हिस्सा खोलकर ‘सिम कार्ड’ बाहर निकाला और तोड़कर एक तरफ़ पड़े कूड़े के ढेर में उछाल दिया।
‘न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी।‘
उसने हाथ देकर एक ऑटो रुकवाया और उसमें सवार हो गई।

!! समाप्त !!