Saturday, March 2, 2013

कतनी सुरक्षित हैं महिलाएं

चार भाई बहनों में सबसे छोटी मनीषा जिसकी सौम्यता व सुन्दरता की मिसाल आस पड़ोस के लोग ही नहीं बल्कि जिस कॉलेज में वह पढ़ती थी वहां के स्टुडेंट और टीचिंग स्टॉपफ सभी देते थे। ब्रेन विद ब्यूटी का आलम यह था कि उसने अपने कालेज की सबसे सूबसूरत व इंटेलिजेंट लड़की का खिताब भी जीता। पढ़ाई में हमेशा अव्वल रहने वाली मनीषा कॉलेज की शान मानी जाती थी। लेकिन आज वही हर दिल अजीज, खूबसूरती की मिसाल मनीषा अस्पताल के बैड पर लेटी बुरी तरह कराह रही है। उसे देखकर दोस्तों व रिश्तेदारों के आंसू हैं जो थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। जो कोई भी अस्पताल पहुंचा उसे देखकर भय से कांप उठा, चेहरा पूरा पट्टियों से ढका है हाथ और पांव बुरी तरह झुलसे हुए हैं। इस मासून ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि इसे अपनी छेड़खानी का विरोध् करने की इतनी भयानक सजा मिलेगी। इस मासूम पर दौलत के नशे में अंध्े कुछ रईसजादों ने उसके ऊपर तेजाब डालकर इसे बुरी तरह झुलसा दिया... आखिर क्यों आध््रमिकता की ओर अग्रसर समाज इतना असंवेदनशील होता जा रहा है। जो महिला के अस्मत और जीवन के साथ खिलवाड़ करने में भी समाज के हैवानों के हाथ नहीं कांपते हैं-
देश के महिलाओं संबंध्ति बहुचर्चित मामले जैसे नैना साहनी हत्याकांड, जेसिका लाल मर्डर केस, आरुषि हत्याकांड, अरुणिमा केस, निठारी कांड, सौम्या रंगनाथन, शिवानी भटनागर, प्रियदर्शिनी भट्टू, रुचिका हत्याकांड, आदि महिलाओं
सरसरी दृस्टि-
घर में बच्ची का जन्म होते ही मां बाप को सबसे बड़ा डर उसकी सुरक्षा को लेकर ही होता है। इसके अतिरिक्त मां-बाप यही सोचते हैं कि बेटियां कितनी भी पढ़ लिख जाएं लेकिन आखिर बाद में तो उन्हें संभालनी घर की चूल्हा चौकी है। कुछ मां बाप सोचते हैं कि बाद में बेटी को ससुराल विदा करने के साथ-साथ अच्छा खासा दहेज भी साथ में देना पड़ेगा। शायद यही वजह है कि देश में आज भी बड़े स्तर पर कन्या भ्रूण हत्या जैसी घटनाएं हो रही हैं। समाज की ऐसी सोच बेटियों के लिए खतरनाक साबित होती है। घर में पहला लड़का होने पर खुशियों का माहौल छा जाता है। जबकि अगर पहली बेटी हो जाए तो घरवालों को उतनी खुशी नहीं होती। क्या बेटी होना गुनाह है? पहले बेटे के बाद बेटी हो तो ठीक लेकिन पहली बेटी के बाद दूसरा बेटा ही होना चाहिए।
पिफर थोड़ा बड़े होने पर जब वह स्कूल जाने लगती है तो उसकी सुरक्षा की चिन्ता की कहीं उसके साथ कोई अनहोनी न हो जाए यह डर मां बाप को चैन की नींद सोने नहीं देता, स्कूल या कॉलेज जाने पर कहीं उसका किसी के साथ अपफेयर न चल जाए कहीं वह अपनी पसंद से कसी गैर जाति या र्ध्म के लड़के से विवाह करके समाज में हमारा उठना बैठना ना बंद करवा दें... समाज की ऐसी सोच ऑनर किलिंग जैसी घटनाओं को भी बढ़ा रही हैं। जहां पर बेटियों की इज्जत के नाम पर निर्मम तरीके से हत्या कर दी जाती है।
बलात्कार और यौनशोषण की घटनाएं तो महिलाओं के जीवन को तार-तार कर देती हैं। ऐसी घटना की शिकार महिला के साथ समाज ऐसा घृणित व्यवहार करता है कि मानसिक तनाव में आकर वह आत्महत्या तक कर लेती है। हॉल ही में एक गैर सरकारी संस्था द्वारा कराए गए सर्वे में दिल्ली के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय की कई छात्राओं ने यह अपना नाम छुपाते हुए यह खुलासा किया कि परिवार के कई सदस्यों द्वारा बचपन में उनके साथ भी यौन उत्पीडन से संबंध्ति घटनाएं हो चुकी हैं। मनोवैज्ञानिक भी इस बात को स्वीकारते हैं कि बचपन में बच्चों के साथ ऐसी घटनांए सारी उम्र उन्हें मानसिक रुप से परेशावन करती हैं। जिसका असर उनके व्यक्तित्व पर भी पड़ता है, क्योंकि ऐसे मामलों में भय या शर्म से बच्चे ऐसी बातों का खुलासा नहीं कर पाते।
समय बदलने के साथ-साथ भले ही समाज में और देश में महिला सशक्तिकरण की बातें होती रहें लेकिन यह भी एक बड़ी सच्चाई है कि महिलाओं के प्रति पुरुषों की सोच में आज भी बदलाव नहीं आया है। यही कारण है कि ऑपिफसों में कार्यरत महिलाओं व सड़कों पर चलती महिलाओं के अलावा आज अपने ही घर में अपने रिश्तेदारों से महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं।
बनना होगा मजबूत और संघर्षशील
आए दिन सड़कों पर चैन स्नैचिंग की घटनाएं हो रही है। जिनमें से सबसे अध्कि ये घटनाएं महिलाओं के साथ हो रही है। इस बात पर सर्वोदय विद्यालय में हिन्दी टीचर मध्ु का कहना है कि हमारे घरों में बचपन से ही बेटियों की मानसिकता को ऐसा बनाया जाना चाहिए कि वो अबला नहीं सबला हैं। मतलब कि मौका आने पर दुर्गा या काली बनने से भी पीछे न रहो। हमारे साथ छेड़खानी या चैन स्नेचिंग जैसी घटनाएं आसानी से इसलिए हो जाती हैं कि हम डटकर इसके लिए विरोध् व संघर्ष नहीं करते अगर बस या सड़क पर किसी महिला के साथ छेड़खानी होती है तो वहां खड़ीं अन्य महिलाओं को मिलकर इस बात का विरोध् करना चाहिए। इसके अतिरिक्त महिलाओं को अपनी सेल्पफ डिपफेंस के लिए जूडो कराटे आदि भी सीखने चाहिए ताकि उनका पर्स चोरी करने या चैन स्नेचिंग करने पर चोरी करने वाले को ऐसा करारा जवाब दिया जाए कि वह भी अगली बार किसी महिला के साथ ऐसा करने पर दस बार सोचे।
नाईट शिफ्रत करने वाली महिलाओं की सुरक्षा
देश में रात की पॉली में कार्य करने वाली महिलाओं की सुरक्षा को लेकर भी कई सवाल उठ खड़े हुए हैं क्योंकि पिछले वर्ष दिल्ली में रात की पॉली में काम करने वाली महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार की खबरें अखबारों में छपी, इन घटनाओं के बाद दिल्ली सरकार नींद से जागी और पिफर बीपीओ कंपनियों व कैब मालिकों को सख्त दिशा निर्देश दिए गये जिसके अन्तर्गत ऐसी महिलाओं की सुरक्षा के मद्देनजर सरकार ने कम्पनियों को कहा कि रात की पाली में काम करने वाली महिलाओं को सुरक्षित घर छोड़ने की जिम्मेदारी कम्पनी की होगी। साथ ही रात की पाली में काम करने वाली इन महिला कर्मचारियों को घर के दरवाजे तक छोड़ना होगा आदि। पर यह बिडम्बना ही है कि जब कोई घटना घटित होती है तो तभी प्रशासन की नींद खुलती है कुछ दिन दिशा निर्देशों का सख्ती से पालन होता है पिफर वही पुराने ढर्रे पर कार्य होने लगते हैं। यही कारण है कि रात में महिलाएं कभी सुरक्षित महपफूज नहीं करतीं।
देश की राजधनी दिल्ली में बढ़ती असुरक्षा
देश की राजधनी दिल्ली और दिल्ली वालों का दिल द द दिल्ली आज महिलाओं के लिए पूरी तरह असुरक्षित हो गयी है। दिल्ली में हर वर्ष लाखों की संख्या में रोजगार की तलाश में देश के अविकसित क्षेत्रों, ग्रामीण व दूर दराज के इलाकों से लोग आ रहे हैं। हाल ही में घटी कुछ घटनाओं में महिलाओं के खिलापफ बढ़ते क्राईम ग्रापफ को देखकर तो दिल्ली सरकार ने भी हाथ खड़े कर लिए हैं। आज दिल्ली की हालत यह है कि यहां महिलाएं ही नहीं मासून बच्चे जिनमें लड़के व लड़कियां दोनों शामिल हैं इनके अलावा बुजुर्ग महिलाएं भी असुरक्षा के साए में जी रही हैं। यह बात दिल्ली में घटी दो घटनाओं जिनमें एक में बच्चों को स्कूल ले जाने वाली कैब ड्राइवर ने ही एक विध्वा महिला के तीन बच्चों जिनमें दो लड़के व एक लड़की भी शामिल थे नशीला पदार्थ खिलाकर कई बार उनके साथ दुष्कर्म किया। उसने बच्चों के मन में इतना खौपफ भर दिया कि इतने समय से बच्चे मां से भी कभी कुछ न बोल पाए। मगर जब बात का खुलासा हुआ तो बहुत देर हो चुकी थी। इसके अलावा दूसरी घटना में दिल्ली के रोहिणी इलाके में 77 वर्षीय बुजुर्ग महिला के साथ एक रिक्शेवाले ने बलात्कार किया। आखिर क्यांे समाज नैतिक पतन की दलदल में ध्ंसता जा रहा है। दिल्ली की एक अन्य घटनायें एक कॉलेज की छात्रा को राह चलते कुछ लड़के कार में उठाकर ले गए और छात्रा के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया।
नेशनल क्राइम रिकॉड ब्यूरा की रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली महिलाओं के साथ केवल बलात्कार व छेड़छाड ही नहीं, बल्कि बड़े स्तर पर हत्या के केस भी दर्ज हुए हैं। दिल्ली में होने वाली हत्याओं में से एक चौथाई संख्या महिलाओं की हैं। वर्ष 2010 के आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि दिल्ली में बलात्कार के 489 केस दर्ज हुए जो वाकई में एक गंभीर बात है। जिसके निदान के लिए सख्त से सख्त कदम उठाए जाने चाहिएं।
आखिर क्यों अपराध्ी ऐसा करने से खौपफ नहीं खाते हैं? अपराध्यिों के मन में पुलिस व कानून का खौपफ खत्म होता जा रहा है। और इसका सबसे बड़ा कारण भ्रष्टाचार ही है। अपराध्ी अगर पकड़ा भी जाता है तो बड़ी आसानी से पुलिस को मोटा पैसा खिलाकर छुट जाता है। यही कारण है कि दूसरा अपराध करने के लिए उनके हौंसले बुलंद हो जातें हैं। तभी तो महिलाओं के प्रति क्राइम ग्रापफ घटने की बजाए दिन पर दिन बढता ही जा रहा है। जबकि बलात्कारी आराम से ध्ूमता पिफरता है। यही वजह है कि लोकलाज के चलते कई मामले उजागर भी नहीं हो पाते। महिलाओं के साथ दुष्कर्म करने वाले अपराध्यिों को कानून द्वारा सख्त से सख्त सजा दी जानी चाहिए।
कुछ मामलों में महिलाएं स्वयं भी दोषी
बहुत बार ऐसे भी मामले सामने आते हैं जिनमें महिलाएं अपने साथ होने वाले यौनशोषण के लिए स्वयं भी जिम्मेदार होती है। क्योंकि पश्चिमीकरण और आध्ुनिकता की दौड़ में अंध्ी कुछ युवतियों व महिलाएं अपनी स्वतंत्राता का नाजायज पफायदा उठाती है। जिसमें सबसे बड़ा दोष उनके पहनावे व आध्ुनिक सोच को गलत दिशा की ओर मोड़ने का होता है ऐसी खुलेआम ऐसी पौशाकें पहनकर घुमना जिसमें अंगप्रदर्शन बढ़चढ़ कर दिखावा हो। कुछ युवतियां तो जानबूझ कर अपनी भाव भंगिमाओं द्वारा युवकों को उनका पीछा करने के लिए उकसाती हैं। तो ऐसे मामलों में पुरुषों को ही दोष देना सही नहीं है। बल्कि परिवार के लोगों को ही लड़कियों की सुरक्षा को घ्यान में रखते हुए उनपर विश्वास तो करना चाहिए लेकिन उस विश्वास को अंध्विश्वास में परिवर्तित कर लड़कियों को संस्कारों को तिलोनलि देकर मनमानी करने की छूट नहीं दी जानी चाहिए।
माना कि आज जमाना महिला सशक्तिकरण का है वह घर परिवार और ऑपिफस को संभालने की दोहरी भूमिका निभा रही है। आज ऐसा कोई भी क्षेत्रा नहीं बचा है जहां वे न पहुंच पाई है। वह हर क्षेत्र में पुरुषों को कड़ी टक्कर दे रही है। लेकिन कहीं न कहीं वे असुरक्षा के वातावरण में जी ही रही है। इसके लिए केन्द्र राज्य सरकारों को मिलकर जितना हो सके उनकी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाने चाहिए साथ ही लोगों को महिलाओं के प्रति अपने नजरियों में बदलाव लाने होंगे तब स्थिति कापफी हद तक बदलेगी।

Friday, March 1, 2013

पहला प्यार
मौत की आहट ने खोली मोहब्बत की राह
आप सभी की जिन्दगी में कभी ना कभी कोई ना कोई घटना ऐसी अवश्य घटित हुई होगी जिसका जिक्र आपने दूसरों से किया हो और लोगों ने उसे मनघड़ंत समझा हो। मगर आप जानते हैं कि वह घटना मनघड़ंत हरगिज भी नहीं थी। ऐसा ही मेरे साथ है मैं सच लिख रहा हूं एक ऐसा सच जिसपर शायद आप कभी भी यकीन न करें।
वह शुभ और मनहूस दिन था। 15 मार्च 2009 का, शुभ इसलिए क्योंकि इसी दिन मेरे सपनों की रानी प्रियंका मुझे मिली थी और मनहूस इसलिए क्योंकि इसी रोज मैं ऐसी मुसीबतों में पंफसता चला गया कि जान के लाले पड़ गये।
हुआ यह कि उस रोज मैं घर से सुबह 10 बजे आपिफस के लिए निकला तो उस रास्ते में जाम मिला, जिधर से मैं नियमित रूप से जाता था। मैंने तत्काल निर्णय लेते हुए गाड़ी बैक की और यू टर्न लेकर गाड़ी कच्चे रास्ते पर डाल दी। यह रास्ता एक छोटे से जंगल के बीच से गुजरता था, मगर बीस मिनट के सपफर के बाद मैं वापस पहले वाली सड़क पर पहुंच सकता था।
अभी मैं कुछ आगे ही बढ़ा था कि एक लड़की के चीखने की आवाज मुझे सुनाई पड़ी। हड़बड़ाकर मैंने कार रोक दी और चीख की दिशा जानने का प्रयास करने लगा। कुछ मिनट यूं ही गुजरे, मगर चीख दोबारा नहीं सुनाई दी।
मैंने बेमन से कंधे उचका दिये और उसे अपना भ्रम समझकर कार आगे बढ़ा दी। अभी 15-20 मीटर ही आगे बढ़ा होऊंगा कि मुझे बाईं तरपफ की झाड़ियों के पीछे एक कार की झलक मिली। मैं उसके करीब पहुंचा।
फ्एनी बॉडी हियर!य् मैं तनिक उच्च स्वर में कार के करीब पहुंचकर बोला। जवाब में सन्नाटा, मैं कार के एकदम करीब पहुंचा और खिड़की से झांककर भीतर देखने की कोशिश की और...एक खून अलूदा चेहरा दिखाई दिया, जो पिछली सीट पर निश्चेष्ट पड़ा था। जीवन के कोई चिन्ह शेष न थे पिफर भी मैंने उसकी नब्ज टटोली, नब्ज गायब थी। एक डॉक्टर होने के नाते मुझे अंदाजा लगाते देर न लगी कि उसका कत्ल कुछ मिनटों पहले ही किया गया था।
शव किसी युवती का था, जीवित अवस्था में वह यकीनन बेहद खूबसूरत रही होगी।
मैंने इध्र उध्र देखने के बाद अपना मोबाइल निकाल कर पुलिस को पफोनकर मामले की सूचना दे दी। अभी मैं पुलिस का इंतजार कर ही रहा था कि तभी तीन पहलवान जैसे लोग वहां पहुंचे और उन्होंने मुझे थाम लिया। मैंने उनके चंगुल से निकलने की कोशिश की तो उनमें से एक ने मेरे पेट में जोरदार घूंसा जड़ दिया मैं हलाल होते बकरे की तरह डकारा था। पिफर दोबारा विरोध् करने की हिम्मत मेरी नहीं हुई और मैंने चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी। वे तीनों मुझे लेकर एक झोंपड़ेनुमा मकान में पहुंचे।
वहां मेरे अलावा दो मेहमान और थे, मगर वे दोनों लड़कियां थीं, और बुरी तरह सहमी हुई थीं। करीब आधे घंटे तक मैं उन दोनों का मनोवैज्ञानिक तौर पर इलाज करता रहा। इसके बाद कहीं जाकर मुझे पूरी स्थिति पता चली।
कहानी यह थी कि वे तीनों सहेलियां थीं। तीनों को एक टीवी सीरियल के लिए आडिशन देने पटना जाना था। सड़क पर जाम की वजह से उन तीनों ने शार्टकट अपनाया था और इस मुसीबत में पंफस गई थी। कत्ल हुई लड़की ने अपहर्ताओं का विरोध किया तो उसे गोली मार दी गई थी। वहां मौजूद दोनों युवतियों में से एक जिसका नाम प्रियंका था उसने बताया कि ये लोग किडनैपर हैं और उनके घरवालों को पिफरौती के लिए फोन कर चुके हैं।
थोड़ी देर बाद दरवाजा खुला और एक रिवॉल्वरधारी ने आकर दूसरी युवती परी को बेहिचक शूट कर दिया। मैं और प्रियंका कांप कर रह गये। मगर यह वक्त डरने और भावनाओं में बहने का नहीं था। मैंने पफौरन अपना अगला कदम निर्धारित किया और इससे पहले की परी की हत्या कर चुकने के बाद वह कमरे से बाहर निकल जाता। मैंने पीछे उस पर धावा बोल दिया और उसे अपने बाजुओं में जकड़कर पूरी ताकत से उसका सिर दीवार पर दे मारा। वह हलाल होते बकरे की तरह डकारा। मैंने पिफर, पिफर और पिफर वही प्रक्रिया दोहराई। वह निश्चेष्ट हो पफर्श पर गिर पड़ा, मैंने उसकी रिवाल्वर उठा ली और प्रियंका के साथ सावधानीपूर्वक बाहर निकल आया।
हम दोनों भागते हुए सड़क तक पहुंचे तब तक पुलिस की जिप्सी वहां पहुंच चुकी थी। आगे का काम पुलिस का था उन्होंने हमें थाने आकर स्टेटमेंट देने की कह छोड़ दिया था।
उस घटना ने मुझे और प्रियंका को कापफी करीब ला दिया। हम डेटिंग करने लगे और करीब दो साल बाद हमने शादी कर ली। प्रियंका मुझे बहुत प्यार करती है। अगर उस रोज की घटना दो कत्ल से न लिपटी होती तो मैं बेशक कहता कि वह मेरे लिए सबसे खुशनूमा दिन था।

-रोहन सिंह
पहला प्यारद्
ये इश्क नहीं आसां
गालिब मियां ने लिखा है-
ये इश्क नहीं आसां, बस इतना समझ लीजै।
इक आग का दरिया है, और डूब के जाना है।।
ये बात उस वक्त जितनी सत्यता के ध्रातल पर खरी उतरती थी, उतनी ही आज भी इसकी प्रासंगिकता बनी हुई है। भले ही हम 21वीं सदी के जीव हैं लेकिन सच्चाई ये है कि आज भी हिन्दोस्तान की 70 पफीसदी जनता इश्क के खिलापफ है, यही कारण है कि दो प्यार भरे दिलों को पहले तो जुदा करने की कोशिश की जाती है और जब कामयाबी नहीं मिलती तो उन्हें अलग करने के लिए उनकी हत्या करने जैसा कदम उठाने से भी लोग नहीं हिचकते।
मैं उफपर वाले को ध्न्यवाद देती हूं कि मैं और मेरा प्रियतम, प्रेम विवाह कर समाज और परिवार से बगावत करने के बाद भी अभी तक जीवित हैं। अलबत्ता यह जीवनदान कब तक बना रहेगा इसके बारे में तो उफपर वाला ही बेहतर जानता है।
हमारी मोहब्बत की शुरूआत हुई आज से करीब 2 साल पहले जब पहली बार मैं राज से मिली, वह एक सीध सादा किंतु सुलझा हुआ युवक है। हम दोनों की मुलाकात एमए की क्लास में हुई। हम दोनों ही जॉब करते थे और इग्नू से एमए का पफार्म भर रखा था जिसकी क्लासेज के लिए हर सप्ताह रविवार के दिन हम जामिया मीलिया इस्लामिया कालेज में जाते थे।
हमारे आलावा वहां क्लास में करीब 40 स्टूडेंट और थे, मगर राज उन सब में अलग दिखाई देता था। एकदम शांत, गम्भीर, उसकी यह सादगी ही मेरे दिल में उतरती चली गई। और मैं उससे दोस्ती करने को बेकरार रहने लगी, सच पूछिये तो मरी जा रही थी, मगर वह था कि कोई भाव ही नहीं देता था।
ना ना इसका मतलब आप यह हरगिज भी ना निकालें कि मैं कोई बदसूरत सी लड़की हूं जिसकी तरपफ कोई लड़का ध्यान देना जरूरी ना समझे। उल्टा मैं बेहद खूबसूरत गठे हुए शरीर वाली युवती हूं और मुझे थोड़ी शरम आ रही है लेकिन पिफर भी बता दूं कि वहां पर राज के आलावा बाकी सभी लड़के मुझे देखकर लार टपकाते नजर आते थे। उनकी आंखों में एक भूख दिखाई देती थी, जो मुझे सख्त नापसंद थी, ऐसा नहीं था कि मैं कोई साध्ु सन्यासिनी बनने का ख्वाब देख रही थी, बल्कि मुझे हर चीज को हर काम को तरीके से करना पसंद था। मुझे भूख कैसी भी हो सख्त नापसंद थी, पिफर चाहे वह जिस्म की भूख हो या पेट की भूख! दरअसल भूखा इंसान अपनी भूख मिटाने के चक्कर में सामने वाले की भावनाओं को हमेशा आहत करता है। वह झपट्टा मारता है, टूट पड़ता है और जल्दीबाजी के चक्कर में वह यह हमेशा भूल जाता है, कि इसकी वजह से वह दूसरे को भूखा मार देता है, अपनी संतुष्टि के लिए वह कुछ देर के लिए सबकुछ भुला बैठता है। बस यही वजह है कि मुझे भूखे लोग पसंद नहीं हैं।
तो मैं राज की बात कर रही थी वह अलग था सबसे अलग, शुरू में तो वह किसी की तरपफ देखता ही नहीं था पिफर जब मैंने उससे बातचीत की पहल की तो वह ध्ीरे ध्ीरे खुलने लगा। और जल्दी ही हम क्लास के बाद लम्बी लम्बी बातें करने लगे। इस दौरान वह इतनी तन्मयता से मेरी आंखों में देखता था जैसे कोई भक्त अपने अराध्य देव की सूरत निहार रहा हो, मैं बोलती रहती और वह सुनता रहता, बीच बीच में हूं हां में संक्षिप्त जवाब देता रहता, जाने वह रोज रोज मेरी आंखों में क्या देखता था, मैं पूछना चाहती थी मगर नहीं पूछा, डर था उसके बाद वह यूं मुझे निहारना बंद ना कर दे। जबकि उसके द्वारा इस तरह देखे जाने मुझे बहुत भाता था।
खैर जल्द ही हम अच्छे दोस्त बन गये, और एक रोज जब उसने मेरा हाथ अपने हाथ में थाम कर कहा कि शबनम मुझे तुमसे प्यार हो गया है मैं सदा सदा के लिए तुम्हे अपने प्यार के बंध्न में बांध् लेना चाहता हूं, उसकी बात सुनकर मैं अवाक रह गई, मुझे उम्मीद भी नहीं थी कि वह कभी अपने प्यार का इजहार करने की हिम्मत जुटा पायेगा। मगर उसने यह कर दिखाया था।
जैसा की हमारे नामों से आप अंदाजा लगा चुके होंगे कि मेैं मुस्लिम थी तो वह हिन्दू, लिहाजा यह इश्क आसां नहीं था।
मैंने जब यह समस्या उसके सामने रखी तो वह हंसने लगा और बोला मेरे गम्भी स्वभाव को मेरी कमजोरी मत समझो शबनम, मैं तुम्हे दुनिया से चुरा ले जाउफंगा और तुम्हे अपनी पलकों पर बिठाकर रखूंगा, बस एक बार तुम हामी भरकर देखो।
मैं भला कैसे इंकार करती। मैंने झट उसकी मोहब्बत स्वीकार कर ली, इसके बाद हम दोनों ने अपने अपने घर में अपनी मोहब्बत का ढिंढोरा पीट डाला नतीजा वही हुआ जो होना था, कोहराम मच गया।
किंतु हम इसके लिए पहले से ही तैयार थे अतः हमने कोर्ट मैरिज कर ली।
आज हम एक खुशहाल जिन्दगी जी रहे हैं मगर अपनों से बहुत दूर, जहां हमें कोई नहीं जानता।
-शबनम


लघु कथाएं
सुख का आधार
लम्बे अर्से बाद चिट्ठी आई थी। जसबीर ने पलट कर पीछे देखा। प्रेषक वही था, जिसका जिक्र वह प्रायः करता ही रहता था। बचपन वेफ मित्रा परेश का पत्रा पाकर जसबीर बहुत खुश था। शीघ्रता से उसे खोला और पढ़ने लगाµ
माई डियर जसबीर!
यहां लन्दन में खूब ठाठ हैं। कारों, होटल, पार्टी-पिकनिक, वैफबरे, पॉप म्यूजिक...पैसों की यहां कोई कमी नहीं है। चाहिए वुफछ कर दिखाने वाला। देखिए न, मैंने वुफछ ही वर्षों में यहां करोड़ों का कारोबार कर लिया है। ...ओ.वेफ.! बाकी बातें अगले पत्रा में लिखूंगा।य्
जसबीर पत्रा पढ़कर गहरे ख्यालों में डूब गया था। परेश ने ठीक बारह वर्ष पहले उसवेफ सामने विदेश जाकर काम करने का प्रस्ताव रखा था। परन्तु जसबीर मातृभूमि को किसी भी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं हुआ था। आज जसबीर वेफ पास परेश की तुलना में बैंक बेलेन्स भले ही वुफछ नहीं था, परन्तु उसवेफ अपने स्नेहिल, विनयशील बाल-बच्चे थे। परिवार वेफ प्रति समर्पण भाव था। जननी-जन्म भूमि की सौंधी गंध उसकी हथेलियों से पूफटती थी। जसबीर गरीब होकर भी सम्पन्न था, जबकि परेश वेफ पास करोड़ों का बेलेन्स होने वेफ उपरान्त भी इन सबका अभाव था।
वेफयर टेकर
बंगला कापफी बड़ा था और उस बंगले में जो दफ्रतर था, वह सरकारी था। जैसा कि प्रायः होता है, उस दफ्रतर का एक वेफयर-टेकर था और उसका क्वार्टर दफ्रतर वेफ परिसर में ही था। वेफयर-टेकर था सुखपाल, उम्र कोई चालीस और विधुर था। बाल-बच्चे नहीं, अवेफला ही रहता था।
दफ्रतर का माली था दीनानाथ, उम्र साठ पार, पर उम्र सरकारी अभिलेखों में दस साल लिखी थी। पत्नी गुजर चुकी थी। एक बेटी वेफ हाथ पीले कर चुका था। दूसरी थी छमिया। वह अविवाहित थी, अभी और जीवन वेफ सत्राह बसन्त उसे निखार चुवेफ थे। दीनानाथ की दशा कापफी दयनीय थी। बीमारियों वेफ कारण वह उम्र से दस साल ज्यादा लगता था। उसी बंगले में उसका छोटा क्वार्टर था।
शनिवार छुट्टी का दिन था। शाम छह बज चुवेफ थे। सुखपाल कमरे में बैठा कोई पत्रिका पढ़ रहा था। तभी छन्न की आवाज हुई। वह उठा और देखा, खिड़की का शीशा टूटा है, कांच बिखरी है और वहां एक पत्थर भी पड़ा है। सुखपाल तेजी से खिड़की तक गया। उसे भागती हुई छमिया दिखाई दी। सुखपाल समझ गया कि खिड़की का शीशा किसने और वैफसे तोड़ा।
सुखपाल बाहर आया, तब तक छमिया अदृश्य हो चुकी थी। उसने दीनानाथ को आवाज देकर बुलाया और सारी घटना बता कर कहा, फ्छमिया को भेजो, पूछताछ करूंगा, यह सरकारी नुकसान है, भरपाई करनी ही होगी, नहीं तो पुलिस वेफस करना पड़ेगा। उसे लौटने में देर हो तो पिफक्र मत करना, आखिर में वेफयर टेकर हूं न!य्
छमिया आई, तो पहले दीनानाथ ने घुड़की पिलाई, पिफर कहा, फ्सौ रुपए का नुकसान हुआ है, तुझे ही भरना होगा, तेरे बाप की तो औकात नहीं।य्
छमिया सहम गई तो सुखपाल ने पैंतरा बदला और अपने पास खींच कर कोमल व्यवहार करने लगा।
सुखपाल ने कहा, फ्अपनी खिड़की खोल।य् छमिया उसकी निगाहों को समझ रही थी।
तभी वह आगे बढ़ा और उसकी ब्लाऊज अलग कर दी। चोली थी नहीं। बोला, फ्तेरी खिड़की वेफ शीशे तो बड़े चमकदार हैं।य् वह हाथ पेफरने लगा। छमिया निर्विरोध सहती रही। सुखपाल ने उसे बेड पर खींच गिराया और कहा, फ्खिड़की देख ली...अब दरवाजा तो खोल।य्
सुखपाल ने वही किया, जो वह चाहता था। उसे बहुत हल्का-सा बल प्रयोग करना पड़ा। छमिया, सौ रुपए कहां से देती, न उसका बाप भर सकता था, वह तो वही दे सकी थी, जो उसवेफ पास था।
छमिया पलंग पर उघाड़ी पसरी थी चुपचाप आंखें बन्द किए। सुखपाल ने दरवाजा खोल लिया था और भीतर-बाहर आ-जा रहा था। कोई अवरोध न था, वह वेफयर-टेकर जो था। दीनानाथ सारी रात छमिया की राह देखता रहा। वह भोर में लौटी।
प्रवेश वर्जना
एक स्वामी जी वन-वासियों की दशा का अध्ययन करने वनवासी क्षेत्रा में पहुंचे। वे उनवेफ हित में वुफछ करना चाहते थे।
स्वामी जी एक वनवासी वेफ झोपड़े में प्रवेश करने जा रही रहे थे कि उन्हें किसी ने आवाज देकर टोका और रोका, फ्रुकिए, आप अन्दर नहीं जा सकते।य्
फ्मैं वनवासियों की समस्याओं और उनकी दशा का अध्ययन कर सेवा-कार्य करना चाहता हूं।य् स्वामी जी ने कहा, फ्आप मुझे भीतर जाने से रोक क्यों रहे हैं?य्
वनवासी बोला, फ्मैं अपने झोपड़े में बैठा कर आपका स्वागत नहीं कर सकता। इसीलिए रोक रहा हूं।य्
फ्ऐसा क्यों, भीतर क्या समस्या है,य् पूछा स्वामी ने।
वनवासी कातर हो, कहने लगा, फ्भीतर मेरी पुत्रावधू हैं और वह निर्वस्त्रा बैठी हैं।य्
ऐसा क्यों, फ्स्वामी जी चौंक उठे।य्
वनवासी ने बताया, फ्मेरी पत्नी बाजार गई है। घर में एक ही धोती है, जो वह पहन गई है और बहू घर में नंगी है। जब मेरी स्त्राी आएगी, तो वह धोती उतार कर उसे देगी, स्वयं नग्न रहेगी।
स्वामी जी हतप्रभ! हे प्रभु, इतनी निर्धनता। वह रो पड़े।
वनवासी ने निवेदन किया, फ्आप बाहर ही बैठ कर हमसे बातें कर सकते हैं।य्
स्वामी जी वुफछ सुनने में असमर्थ थे। वे बस गहरी सोच में थे और आंखों से अविरल अश्रुधारा बह रही थी। वे जिस रास्ते से आए थे, उधर ही लौट पड़े।
भूख
वेफरल वेफ समुद्र-तटीय नगर से लगे एक गांव में रहती थी वह। नगर, गांव और उस स्त्राी का नाम न पूछिए। उनकी लाज पर आवरण रहने दें। नगर जाना-माना है, जहां सभ्य-संभ्रान्त भी रहते हैं और दबंग भी। सेक्स और भूख कहां नहीं? वहां भी है। गांव में गरीबी है। भूख वहां भी है, पर पेट की। वह स्त्राी जवान, खूबसूरत आकर्षण, ब्याहता और दो बच्चों की अम्मा। यह रहा घटनास्थल और प्रमुख पात्रा का परिचय जो कथानक वेफ आवश्यक अंग हैं।
स्त्राी मछली बेचा करती थी। गांव से शहर आती और बाजार में बैठती। उसकी आय से घर-परिवार चलता था।
एक दिन-दहाड़े बाजार से उस स्त्राी को वुफछ दबंग लोग उठा ले गए, कहां? पता न चला। अज्ञात स्थान पर उसवेफ साथ जबरदस्ती की गई। समूह में बलात्कार करने वालों ने उसवेफ अंग-प्रत्यंग की मछलियों से अपनी भूख मिटाई।
अगले दिन वह नर-पिशाचों से मुक्त हो गांव लौटी। रो-रो कर आपबीती सुनाई। बात वुफछ सभ्य लोगों तक भी पहुंची। सलाह दी गई, फ्मुंह छिपा कर घर बैठ, भली औरत-सी बनी रह चुपचाप। पुलिस थाना न जा। वुफछ दिन बाजार जाने और मछली बेचने की भी जरूरत नहीं।य्
इस तरह सलाह पर वह बिपफर गई, फ्ऊंह, घर धरी मछलियां मर जाएंगी। पेट की आग वैफसे शान्त हो। बच्चे बिलख रहे हैं।य् वह तैश में बोली।
उसने शरीर पर लगी नोच-खरोंच पर वुफछ घरेलू दवा लगाई। अंगों को रगड़-रगड़ सापफ किया। मुख में बसी दुर्गन्ध बार-बार थूक कर दूर की।
हादसे का डर दूर किया उसने। मर्दों की मर्दानगी पर लानत पेंफकी। अगले दिन बाजार पहुंच गई, मछलियां बेचते। भूल गई देह का दर्द, अपने और बच्चों वेफ पेट में भूख की आग जो थी।
ग्राहक आते रहे। वह मछलियां तौलती रही। भूखीं निगाहें गड़ती रहीं तेज अैर तेज। वह मन ही मन नामर्दों को गालियां देती रही।
विनिमय
आन्ध प्रदेश का एक कस्बा। दो परिवार थे। एक परिवार वेफ पास बकरियां अधिक थीं। एक परिवार वेफ पास लड़कियां अधिक थीं। एक वेफ लिए बकरियां बोझ। दूसरे वेफ लिए लड़कियां बोझ। बकरियों वेफ स्वामी ने सोचा, इन्हें खिलाने में बड़ा खर्च है, वुफछ को बेच दिया जाए। लड़कियों वेफ मां-बाप ने सोचा, सयानी होकर ब्याह का बोझ डालेंगी। चार में से एक को जो दस साल की है, बेच दिया जाए। जवानी की दहलीज पर है, अच्छी रकम हाथ लगेगी।
दोनों परिवारों में बात पट गई। विनिमय तय होगा। लड़की वेफ बदले चार बकरियां। चारा-घास चर कर बकरियां दूध देंगी या अच्छे दामों में यूं ही बिक जाएंगी। विनिमय हो गया। उधर से चार बकरियां आईं, इधर से लड़की चली गई। बकरी वाले परिवार ने लड़की को देखा गौर से। सोचा, बस दो-तीन साल की देर है। अच्छी कमाई उतरेगी। लड़की को बड़े प्यार से ले गए। असहाय लड़की, कातर दृष्टि से, आंसू लिए मां-बाप को देखती रह गई। मां-बाप भूरी-काली बकरियां देख प्रमुदित थे।

Wednesday, February 20, 2013

क्या आप महिलाओं की आजादी के खिलाफ हैं?

मर्द और औरत एक दूसरे के प्रति आज अपराध् के पर्याय बनते जा रहे हैं। औरत को पाने के लिए औरत के साथ ही अपराध् किये जा रहे हैैंं। इसी के बीच जब लिव इन रिलेशन्स, नारी अपराध् और महिलाओं की आजादी पर चर्चा गरम होती है तो हमारी पुरूषवादी मानसिकता इसका तमाम दोषारोपण महिलाओं पर करके सापफ बच निकलना चाहती है। कोई महिलाओं को कपड़े पहनने का सलीका सिखाने लगता है कोई उनके ब्वायपफ्रैंड की गिनती करने लगता है, कोई उनसे मोबाइल छीन लेने की बात करता है तो कोई गांव के लड़कों को लड़कियांे से राखी बंध्वाने की बात करता है। यहीं कुछ महानुभाव ऐसे भी हैं जो अपराध् का शिकार हो रही महिला के संस्कारों को ही दोषी ठहरा देते हैं, और हैरानी तो तब होती है जब ऐसा करने वालों में महिलाएं भी शुमार होती हैं।
उफपर से तुर्रा ये देखिए साहब कि मर्द बलात्कार करे तो चाउफमीन को दोष दिया जाता है। और औरत जो शिकार बनती है उसकी नीयत और सीरत पर प्रश्न चिन्ह लगा दिये जाते हैं। काश हमारे देश के कर्ण धारों ने एक बार भी ऐसा कहा होता कि हम अपने बेटे को ऐसी शिक्षा देंगे कि वह औरत का सम्मान करे।
इतना होने के बावजूद भी हम वक्त आने पर यह जुमला बोल देते हैं कि यत्रा नारियस्तु पूज्यंते तत्रा रमंते देवता, लड़कियां मां दुर्गा का रूप होती हैं मगर सिपर्फ नवरात्राी में। महिलाओं को पुरूषों के समान अध्किार प्राप्त हैं मगर सिपर्फ कागजों में। सचमुच मेरा भारत महान है।
कितना उचित है लिव-इन रिलेशनशिप
एक ऐसा रिश्ता जिसमें दो लोग बगैर शादी के एक ही घर में और यहां तक की एक ही बेडरूम बांटते हैं। लोग आजाद हो चुके हैं, उनके विचार आध्ुनिक हो गए हैं। शादी-ब्याह को पहला दर्जा नहीं दिया जाता है, आज शादी के मायने ही बदलते जा रहे हैं। लोग इस रिश्ते को अच्छा मानते हैं। युवा पीढ़ी तो यहां तक कहती है कि तलाकशुदा जिन्दगी से सो लिव इन रिलेशनशिप अच्छा है। आज पूरे विश्व में यह आम बात है, पश्चिमी सभ्यता के लिए यह धरणा बहुत पुरानी है। कुछ देशों में तो इसे न्यायिक रूप से मान्यता प्राप्त है किन्तु भारतीय समाज में जहां पर नैतिक और पारंपरिक मूल्यों को आज भी महत्व दिया जाता है, इस रिश्ते को अभी भी अपवित्रा माना जाता है।
समय के बदलते दौर जागरूकता, शिक्षा और मुख्यता पिफल्मों और टेलीविजन के कारण युवा पीढ़ी का झुकाव इस रिश्ते की ओर बढ़ता चला जा रहा है। इसी वजह से उनकी सोच बदलती जा रही है। वह पहले लिव इन रिलेशनशिप में रहना और पिफर यदि चाहें तो शादी की सोच, पसंद करते हैं। आज जो लड़के लड़कियां भारत से दूर चले जाते हैं या यूं कहे कि उन्हें पढ़ाई के लिए अथवा नौकरी के लिए जाना पड़ जाता है, वह इस प्रकार के रिश्ते को पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें अपने देश, परिवार और रिश्तेदारों से दूर रहना पड़ता है या ऐसा कह सकते हैं कि हालात उन्हें इस प्रकार से रहने को मजबूर कर देते हैं। अपने घर से दूर उन्हें भावनात्मक सहारे के साथ-साथ पैसों के बारे में भी सोचना पड़ता है। अच्छी जिन्दगी जीने के लिए उन्हें इस प्रकार लिव इन रिलेशनशिप मंे रहना पड़ता है। वहां पर ना तो माता पिता साथ होते हैं और ना ही कोई रोक-टोक, वे बेझिझक एक साथ रहते हैं। उन्हें किसी को जवाब नहीं देना पड़ता। यहां तक कि वहां का देश भी उन्हें बढ़ावा देता है। आइये जाने कुछ और बातें लिव इन रिलेशनशिप के बारे में बिस्तार से।
लिव इन रिलेशनशिप को क्यों महत्व दें
- इसके जवाब मे रिसर्च भी बहुत हुई है। कई सर्वे किए गए तो पता चला कि इस प्रकार के रिश्ते में जो भी रहते हैं एक ना एक दिन शादी के बंध्न में अवश्य बंध्ेंगे, ज्यादा से ज्यादा पांच वर्ष तक साथ रहने के पश्चाता। इस प्रकार के रिश्ते में अध्कितर जो लोग रहते हैं जो एक दूजे से प्यार करते हैं। अध्कि से अध्कि समय साथ बिताना चाहते हैं।
एक दूसरे को समझने के लिए - एक दूसरे के साथ इसलिए भी रहते हैं जिससे एक दूसरे को अच्छी तरह से जान सकें। एक दूसरे की संगति का पता चल सके। यदि जिंदगी भर साथ रहना है तो एक दूसरे को समझना बहुत आवश्यक होता है, जब एक दूसरे को जानते ही ना हो तो एक साथ जिंदगी बिताने की सोच भी कैसे सकते हैं। इसलिये लिव इन रिलेशनशिप अच्छा रास्ता नहीं है।
क्या यह रिश्ता जिन्दगी भर साथ रहता है?µ यूं एस में हुई रिसर्च से पता चला कि 40 प्रतिशत महिलाएं इस प्रकार के रिश्ते में ज्यादा से ज्यादा 10 वर्ष तक रहकर छोड़ देती हैं। ऐसा बहुत ही कम देखने को मिलता है जो जिन्दगी भर चले, उन्हें संतुष्टि प्राप्त नहीं होती है । भारत में केवल कुछ एक बड़े शहरों में ऐसा देखने को मिलता है किन्तु छोटे शहरों में यह अभी भी गलत माना जाता है। यह रिश्ता अध्कितर दोस्ती प्यार की ओर अग्रसर रहता हैं शादी के लिए रास्ता खोल देता है, ऐसे अनेको उदाहरण देखने को मिलते हैं, कि दो लोग किन्हीं कारणों से साथ रहने लगते हैं, यहां तक कि एक ही बेडरूम में रहने लगते हैं। ध्ीरे-ध्ीरे एक दूसरे को समझने लगते हैं और कुछ वर्षों के पश्चात शादी कर लेते हैं।
रिश्ते में दरार आ जाये तो µ एक दूसरे के साथ रहते हुए एक दूसरे की पसंद ना पसंद का भी ध्यान रखना पड़ता है। किसी वजह से यदि रिश्ते में कडवाहट आ जाये तो क्या होगा। सामान्यत भारतीय सभ्यता में इस रिश्ते की कड़ी निन्दा की जाती हैं। हालांकि शहरों की लाइपफ स्टाइल बिल्कुल भिन्न होती जा रही है। वहां पर रह रहे लोग इस रिश्ते को गलत नहीं मानते हैं ना परेशान होते हैं बल्कि वह इसे ठीक मानते हैं कि दो लोग एक साथ रहें तो खर्चा बंटता है। किसी को सहायता की आवश्यकता हो तो तुरंत मिल जाती है, अकेलापन दूर होता है। यदि एक चला भी जाए तो दूसरा रिश्ता कायम हो जाता है। हां समय अवश्य लगता है इससे उबरने में।
24 वर्षीय रीना वो पिछले कई वर्षों से लिव इन रिलेशनशिप में थी। बहुत खुश थी। मस्ती में रहती, कोई चिंता नहीं थी। अचानक वह उदास रहने लगी। पता चला वह जिसके साथ रह रही थी वह किसी बहस की छोड़कर चल दिया। क्या ऐसा शादी के बाद हो सकता है। शायद नहीं। यदि किसी से जीवन भर का साथ जुड़ गया तो आसानी से नहीं टूटता, क्या यह रिश्ते सही हैं?
क्या लिव इन रिलेशनशिप जरूरी है - यह उन लोगों के लिए जरूरी है जो शादी में विश्वास नहीं करते या वो लोग जो शादी के पवित्रा बंध्न में बंध्ने से पहले एक दूसरे की प्रवृति को समझने के लिये साथ रहते हैं। रहते रहते पता चले कि आपस में नहीं बनती, स्वभाव बिलकुल ही भिन्न है या किसी की कोई आदत पसंद नहीं आये तो आसानी से एक दूसरे की जिंदगी से अलग हो सकें। यदि लड़की कामकाजी है तो आज के बड़े शहरों में अकेले रहना मुश्किल हो जाता हे। जहां तक सुरक्षा की ज्यादा जरूरत होती है। लिव इन रिलेशनशिप में कोई डर नहीं रहता, सुरक्षा के साथ साथ पैसों में भी पफायदा मिलता है।
बड़ी उम्र के लोगों में भी लिव इन रिलेशनशिप - आज कल सीनियर सिटीजन में यानि बड़ी उम्र के स्त्राी पुरुषों में भी इस प्रकार का रिश्ता दिखाई पड़ता है। यह उन लोगों में अध्कि होता है जो किन्हीं कारणवश अकेले हो गये हों अथवा शादी ही ना की हो और पेंशन मिलती हो। दोबारा शादी के बंध्न में न बंध्ना चाहते हों क्योंकि शादी कर के उन्हें अपने पैसों को बांटने का डर रहता है। वह भी इस रिश्ते को सही मानते हैं।
इस प्रकार ये कई ऐसी बातें हैं जो लिव इन रिलेशनशिप के लिये ठीक हैं और कुछ ठीक नहीं हैं। कुछ लोग साथ रहते हैं और शादी नहीं करना चाहते हैं, किन्तु कुछेक ऐसे भी होते हैं जो आगे चलकर शादी के बंध्न में बंध्ने के लिये ही साथ रहना चाहते हैं, उनके लिये कुछ ऐसी टिप्स जिससे शादी जैसा पवित्रा रिश्ता सपफल हो सके-
जिसके साथ रहने जा रहे हैं गंभीरता पूर्वक सोचकर तय करें।
एक दूसरे को लिव इन रिलेशनशिप के बारे में जानकारी हो, सारी बातें पहले ही तय कर लें।
उम्मीदों को सीमित रखें। शादी करने या ना करने का तुरंत पैफसला ना लें।
यदि आपको उम्मीद है कि वह शादी के बाद बदल जाएगा तो उससे शादी ना करें।
जो बातें आप अविवाहित में पसंद करते हैं हो सकता है शादी के बाद पसंद ना आये। आंकलन करें।
समय तय करें कि आप कितना समय एक साथ रहें। पहले रिश्ता पक्का करें और शादी की तारिख तय करें ; यह एक रास्ता हैद्ध
एक दूसरे को लगभग छ: माह या एक वर्ष दें जिसमें आप शादी के बारे में गंभीर रूप से बात करें।
एक प्रकार के समझौते पर हस्ताक्षर करें जिसमें आपके पैसों और प्रॉपर्टी के बारे में विस्तार से हों। इस प्रकार की बातचीत रिश्ते को मजबूती प्रदान करेगी।
यदि किसी वजह से अलग होना चाहें तो मदद मिलेगी।
किसी से सलाह लें, दोनों के बारे में जाने। रिसर्च से पता चला है कि स्त्राी-पुरुष दोनों की लगभग एक जैसी शिकायतें रहती हैं, इससे सुविध होगी।
शादी करना चाहते हैं तो हर एक बात के बारे में सोचें कि यदि बदलाव आएगा तो क्या सभी कुछ एक जैसा रहेगा।
बच्चों के बारे में सोचें। एक साथ रहते हुए स्वयं की भावनाओं को रोकें। शादी किसी मजबूरी की वजह से ना करें।
आजकल यह बहुत अध्कि देखने सुनने को मिलता है। लड़का लड़की साथ रहते थे। लड़की मां बनने वाली थी उसने आत्महत्या कर ली। ऐसा हरगिज न करें।
शादी को जीवन में अहमियत दें, इससे जिन्दगी के मायने ही बदल जाते हैं। शादी के बाद बच्चे का जन्म जिंदगी में खुशियां भर देता है। परिवार स्रदृढ बनता है। यदि इन सभी बातों के बारे में आप अपने परिवार के उन सदस्यों से बात करें जो शादीशुदा है। उनके कड़वे मीठे अनुभवों को सुने, समझे। जब उनकी शादी हुई थी वह किसी कठिन दौर से गुजरे तो उन्होंने क्या किया? किस प्रकार वे उन समस्याओं से बाहर निकले आदि बातों को जानकर ही शादी का पैफसला लें। यदि आप लिव इन रिलेशनशिप में हैं और शादी करने की सोच रहे हैं तो लिव इन रिलेशन- शिप
के अच्छे और बुरे दोनों पहलू हैं। अच्छा
यह कि इसमें मजा रहता है। जब चाहे पार्टनर को छोड़ सकते हैं और दूसरे को चुन सकते
हैं। बुरा यदि किसी कारण वश बच्चों का
जन्म हो जाये तो बच्चा सबसे कठिन दौर से गुजरेगा। कभी- कभी तो मां पर इतना असर पड़ता है कि मानसिक तोर से बीमार पड़ जाती है। यदि इस रिश्ते में कड़वाहट आ गई तो कठिनाइयों का अंत नहीं होगा।
सभी पहलुओं को देखते हुए लिव इन रिलेशनशिप के बारे में पता चला कि कुछ
हद तक और कुछ समय के लिए यह रिश्ते सही होते हैं। वास्तव में इस प्रकार के रिश्तों में वह लोग अध्कि जुड़ना पसंद करते हैं जो अपनी जिम्मेवारियों से मुंह मोड़ना चाहते हैं। शादी एक जिम्मेवारी होती है। एक दूसरे को जिंदगी भर साथ निभाने की। परिवार को एक साथ लेकर चलने की। बच्चों को बड़ा करने की यहां तक कि माता-पिता का साथ निभाने की भी। यदि शादी होती है तो इस रिश्ते में जीने की आवश्यकता क्यों होती हैं?
यहां तक कि सेक्स लाइपफ भी सुरक्षित रहती है, जो जिन्दगी की जरूरत है जिसे आप अध्कि प्यार से निभाने में सपफल हो पाते हैं। बावजूद इन सभी बातों के इस रिश्ते को सही कहना या शादी को, यह बात स्वयं पर निर्भर करती है। आज की आध्ुनिकतावादी धरा में लिव इन को पूरी तरह गलत ठहराया जाना पिछड़ेपन की निशानी कही जा सकती है।
कितनी सुरक्षित हैं महिलाएं

चार भाई बहनों में सबसे छोटी मनीषा जिसकी सौम्यता व सुन्दरता की मिसाल आस पड़ोस के लोग ही नहीं बल्कि जिस कॉलेज में वह पढ़ती थी वहां के स्टुडेंट और टीचिंग स्टॉपफ सभी देते थे। ब्रेन विद ब्यूटी का आलम यह था कि उसने अपने कॅालेज की सबसे खूबसूरत व इंटेलिजेंट लड़की का खिताब भी जीता। पढ़ाई में हमेशा अव्वल रहने वाली मनीषा कॉलेज की शान मानी जाती थी। लेकिन आज वही हर दिल अजीज, खूबसूरती की मिसाल मनीषा अस्पताल के बैड पर लेटी बुरी तरह कराह रही है। उसे देखकर दोस्तों व रिश्तेदारों के आंसू हैं जो थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। जो कोई भी अस्पताल पहुंचा उसे देखकर भय से कांप उठा, चेहरा पूरा पट्टियों से ढका है हाथ और पांव बुरी तरह झुलसे हुए हैं। इस मासूम ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि इसे अपनी छेड़खानी का विरोध् करने की इतनी भयानक सजा मिलेगी। इस दौलत के नशे में अंध्े कुछ रईसजादों ने इस मासूम के ऊपर तेजाब डालकर इसे बुरी तरह झुलसा दिया... आखिर क्यों आध्ुनिकता की ओर अग्रसर समाज इतना संवेदनहीन कैसे होता जा रहा है। जो महिला के अस्मत और जीवन के साथ खिलवाड़ करने वाले हैवान आज भी सीना तान कर खुलेआम ध्ूम रहे हैं।
देश में महिलाओं संबंध्ति बहुचर्चित मामले जिनकी खौपफनाक हत्याएं ने सभी महिला की सुरक्षा के विषय में सोचने पर विवश कर दिया था। जैसे नैना साहनी हत्याकांड, जेसिका लाल मर्डर केस, आरुषि हत्याकांड, अरुणिमा केस, निठारी कांड, सौम्या रंगनाथन, शिवानी भटनागर, प्रियदर्शिनी मट्टू, रुचिका हत्याकांड और हाल ही में सबसे ज्यादा जनाक्रोश दिखाने वाला दामिनी प्रकरण आदि।
घर में बच्ची का जन्म होते ही मां-बाप को सबसे बड़ा डर उसकी सुरक्षा को लेकर ही होता है। इसके अतिरिक्त मां-बाप यही सोचते हैं कि बेटियां कितनी भी पढ़ लिख जाएं लेकिन आखिर बाद में तो उन्हें संभालनी घर की चूल्हा चौकी है। कुछ मां-बाप सोचते हैं कि बाद में बेटी को ससुराल विदा करने के साथ-साथ अच्छा खासा दहेज भी साथ में देना पड़ेगा। शायद यही वजह है कि देश में आज भी बड़े स्तर पर कन्या भ्रूण हत्या जैसी घटनाएं हो रही हैं। समाज की ऐसी सोच बेटियों के लिए खतरनाक साबित होती है। घर में पहला लड़का होने पर खुशियों का माहौल छा जाता है। जबकि अगर पहली बेटी हो जाए तो घरवालों को उतनी खुशी नहीं होती। क्या बेटी होना गुनाह है? पहले बेटे के बाद बेटी हो तो ठीक लेकिन पहली बेटी के बाद दूसरा बेटा ही होना चाहिए।
पिफर थोड़ा बड़े होने पर जब वह स्कूल जाने लगती है तो उसकी सुरक्षा की चिन्ता की कहीं उसके साथ कोई अनहोनी न हो जाए यह डर मां बाप को चैन की नींद सोने नहीं देता, स्कूल या कॉलेज जाने पर कहीं उसका किसी के साथ अपफेयर न चल जाए कहीं वह अपनी पसंद से किसी गैर जाति या र्ध्म के लड़के से विवाह करके समाज में हमारा उठना बैठना ना बंद करवा दें... समाज की ऐसी सोच ऑनर किलिंग जैसी घटनाओं को भी बढ़ा रही हैं। जहां पर बेटियों की इज्जत के नाम पर निर्मम तरीके से हत्या कर दी जाती है।
बलात्कार और यौनशोषण की घटनाएं तो महिलाओं के जीवन को तार-तार कर देती हैं। ऐसी घटना की शिकार महिला के साथ समाज ऐसा घृणित व्यवहार करता है कि मानसिक तनाव में आकर वह आत्महत्या तक कर लेती है। हॉल ही में एक गैर सरकारी संस्था द्वारा कराए गए सर्वे में दिल्ली के कई छात्राओं ने अपना नाम छुपाते हुए यह खुलासा किया कि परिवार के कई सदस्यों द्वारा बचपन में उनके साथ भी यौन उत्पीड़न से संबंध्ति घटनाएं हो चुकी हैं। मनोवैज्ञानिक भी इस बात को स्वीकारते हैं कि बचपन में बच्चों के साथ ऐसी घटनाएं सारी उम्र उन्हें मानसिक रुप से परेशान करती हैं। जिसका असर उनके व्यक्तित्व पर भी पड़ता है, क्योंकि ऐसे मामलों में भय या शर्म से बच्चे ऐसी बातों का खुलासा नहीं कर पाते।
समय बदलने के साथ-साथ भले ही समाज में और देश में महिला सशक्तिकरण की बातें होती रहें लेकिन यह भी एक बड़ी सच्चाई है कि महिलाओं के प्रति पुरुषों की सोच में आज भी बदलाव नहीं आया है। यही कारण है कि ऑपिफसों में कार्यरत महिलाओं व सड़कों पर चलती महिलाओं के अलावा आज अपने ही घर में अपने रिश्तेदारों से महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं।
पर यह बिडम्बना ही है कि जब कोई घटना घटित होती है तो तभी प्रशासन की नींद खुलती है कुछ दिन दिशा निर्देशों का सख्ती से पालन होता है पिफर वही पुराने ढर्रे पर कार्य होने लगते हैं। यही कारण है कि रात में महिलाएं कभी सुरक्षित महसूस नहीं करतीं।
नेशनल क्राइम रिकॉड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में महिलाओं के साथ केवल बलात्कार व छेड़छाड ही नहीं, बल्कि बड़े स्तर पर हत्या के केस भी दर्ज हुए हैं। दिल्ली में होने वाली हत्याओं में से एक चौथाई संख्या महिलाओं की हैं जो वाकई में एक गंभीर बात है। जिसके निदान के लिए सख्त से सख्त कदम उठाए जाने चाहिएं।
अपराध्यिों के मन में पुलिस व कानून का खौपफ खत्म होता जा रहा है। और इसका सबसे बड़ा कारण भ्रष्टाचार ही है। अपराध्ी अगर पकड़ा भी जाता है तो बड़ी आसानी से सबूतों के अभाव में छूट जाता है क्योंकि अदालत तो सबूत मांगती है या पिफर कोई रईसजादा पुलिस को मोटा पैसा खिलाकर छुट जाता है। यही कारण है कि दूसरे अपराध् करने के लिए उनके हौंसले बुलंद हो जातें हैं। तभी तो महिलाओं के प्रति क्राइम ग्रापफ घटने की बजाए दिन पर दिन बढ़ता ही जा रहा है।
कुछ महिलायें ऐसी भी हैं जो महिलाओं के साथ होने वाले यौन उत्पीड़न के लिए उन्हीं को दाषी मानती हैं। उनका मानना है कि पश्चिमीकरण और आध्ुनिकता की दौड़ में अंध्ी कुछ युवतियों व महिलाएं अपनी स्वतंत्राता का नाजायज पफायदा उठाती है। जिसमें सबसे बड़ा दोष उनके पहनावे व आध्ुनिक सोच को गलत दिशा की ओर मोड़ने का होता है ऐसी खुलेआम ऐसी पौशाकें पहनकर घुमना जिसमें अंगप्रदर्शन बढ़चढ़ कर दिखावा हो। कुछ युवतियां तो जानबूझ कर अपनी भाव भंगिमाओं द्वारा युवकों को उनका पीछा करने के लिए उकसाती हैं। तो ऐसे मामलों में पुरुषों को ही दोष देना सही नहीं है।
मगर ये महिलाएं उन केसेज के बारे में क्या कहेंगी जिनमें आरोपियों ने कभी किसी बुजुर्ग महिला को तो कभी किसी 6 साल की बच्ची को अपनी हवस का शिकार बना डाला। इसलिए जरूरत महिलाओं को शिक्षा देने की नहीं जरूरत है इस प्रकार के पुरूषों की मानसिकता बदलने की जो उनका परिवार सबसे बेहतर कर सकता है।



 

Tuesday, February 19, 2013

वक्त से पहले सबकुछ पा लेने की चाह में पिफसलते हैं कदम


लड़के-लड़कियांे का एक साथ उठना-बैठना, मिलजुल कर रहना अब कोई आश्चर्य की बात नहीं रही, और सच पूछें तो यह जरूरी भी है ताकि वे एक दूसरे को समझ सकें। लेकिन धीरे-धीरे यह दोस्ती एक ऐसा मोड़ ले लेती है जहां नैतिकता की सीमाएं टूटने लगती हैं, अगर गलती हो गई है तो आजीवन उसे याद करके रोने से कोई पफायदा नहीं, खासतौर से शादी से पूर्व उसे भुला देना बेहद जरूरी है।


आज जब हम आधुनिक संस्कृति के वाहक होने का दावा कर रहे हैं, तो सबसे पहले हमें यह जानने की कोशिश करनी होगी कि वास्तव में आधुनिकता के मायने क्या हैं? क्या पश्चिमी संस्कृति के गुण-दोषों को जाने बिना उसे उसी के संदर्भ में स्वीकार करना आधुनिकता है? या पिफर कुछ उपयोगी बातों को चुनकर उन्हें अपनी संस्कृति व परिवेश के अनुसार आत्मसात करना हमारे हित में होगा?

दुर्भाग्यवश आधुनिकता के नशे में चूर हमारे समाज ने कुछ ऐसी नवीन परंपराओं को अपना लिया है, जो बर्बादी के अलावा हमारे युवा समाज को कुछ नहीं दे सकती। आज हमारे समाज में लड़कियों का लड़कों के साथ मेल-जोल, दोस्ती को बुरी नजरों से नहीं देखा जाता। आजकल युवा वर्ग में जो पैफशन सबसे ज्यादा सिर चढ़ कर बोल रहा है, वह है लड़की व लड़के में प्रेम भावनाओं का हिचकोले लेना। अगर बात केवल आत्मिक प्रेम तक ही सीमित रहे तो कोई हर्ज नहीं, लेकिन दुख की बात तो यह है कि आज प्रेम को दो दिलों के संगम से हटकर दो जिस्मों के संबंध के रूप में देखा जाने लगा है। प्रेम के केवल शारीरिक संबंधों तक ही सिमटने के पीछे आखिर कौन से कारण उत्तरदायी हैं? आज का युवा पाश्चात्य संस्कृति से बहुत अधिक प्रभावित हैं जिसमें सहनशीलता जैसे मानवीय मूल्यों के लिए कोई स्थान नहीं है। तेजी से आ रहे इस बदलाव ने युवा वर्ग को मानसिक रूप से कापफी बदल दिया है। आज हर युवा को बिना समय गंवाए तुरंत सपफलता चाहिए। धैर्य का अब उससे कोई वास्ता नहीं रह गया है। पाश्चात्य संस्कृति में दो लोगों के बीच बने शारीरिक संबंधों को वहां के समाज में हेय दृष्टि से नहीं देखा जाता, लेकिन भारत में आज भी इस तरह के संबंधों को समाज में मान्यता नहीं मिली है। भले ही यह युग लिव इन संबंधों का हो, समलैंगिक संबंधों का हो।

समाज में तेजी के साथ प्रचलन में आ रहे इस तरह के शारीरिक संबंधों का असर लड़की पर ज्यादा पड़ता है। वास्तव में पुरुष सेक्स को उतनी गंभीरता से नहीं लेते, जितना महिलाएं। लड़कियां तो इस मामले में कुछ ज्यादा ही संवेदनशील होती हैं। आज लड़कियों के ये तथाकथित प्रेमी उनकी भावनाओं से खिलवाड़ कर उनके साथ शारीरिक संबंध स्थापित कर लेते हैं। वास्तव में लड़कों के लिए अपनी प्रेमिका के साथ शारीरिक संबंध बनाने का अर्थ अपने दोस्तों के बीच अपनी इज्जत बढ़ाना है। अक्सर देखा जाता है कि लड़कियां भावनाओं में जल्द ही बह जाती हैं, जिसका पूरा-पूरा पफायदा उठाने में लड़के कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते। लड़कियों के लिए अपना सब कुछ किसी को सौंपने का अर्थ है उसे पूरी तरह अपना मान लेना। जहां लड़कियों के लिए सेक्स का मतलब जिन्दगी से होता है, वहीं लड़कों के लिए सेक्स का अर्थ केवल मजे लूटने से होता है। किसी ने कहा भी है, ‘औरत प्रेम पाने के लिए सेक्स के वादे करती है और मर्द सेक्स पाने के लिए प्रेम के वादे करता है।’ लड़कियां प्रेम को बहुत महत्वपूर्ण संबंध के रूप में देखती हैं। यही कारण है कि जब किसी लड़की को अपना वह प्रेमी नहीं मिल पाता, जिसके साथ उसके शारीरिक संबंध, थे, तो वह पूरी तरह टूट जाती है। उसे जहां अपने प्रेमी से बिछड़ने का भय दिन-रात सताता है, वहीं समाज की चिन्ता रही-सही कसर दूर कर देती है। हमारा समाज लड़कियों की पवित्राता पर बहुत जोर देता है। प्रारंभ से ही लड़की के दिमाग में इस बात को अच्छी तरह बैठा दिया जाता है कि लड़की की पवित्राता का अर्थ खानदान की पवित्राता से है। लड़की से अपेक्षा की जाती है कि वह अपना सर्वस्व केवल अपने पति को सौंपेगी। आज की आधुनिक विचारों की पोषक लड़कियां भी इस बात को तहे दिल से स्वीकार करती हैं और जब वे अपना सर्वस्व अपने प्रेमी को सौंप देती हैं तो यह चिन्ता उन्हें सताने लगती है कि इस बात की जानकारी होने पर क्या उनका पति कभी उन्हें स्वीकार करेगा। दूसरी तरपफ इस मामले में लड़कों को समाज का भय न के बराबर होता है। उनकी पवित्राता बनी हुई है या भंग हो गई है, का पता नहीं लग ाने के कारण वे इन संबंधों को सरलता से लेते हैं। आज के आधुनिक समाज में भी एक पति अपनी होने वाली पत्नी से उम्मीद करता है कि वह पूरी तरह से पवित्रा हो, हां उसके स्वयं के पवित्रा होने या न होने का कोई प्रमाण लड़की के पास नहीं होता।

इस स्थिति के लिए लड़कियां स्वयं जिम्मेदार हैं। वास्तव में लड़कियों के लिए आवश्यक है कि वे प्रेम संबंधों में सदैव लक्ष्मण रेखा खींचकर रखें। भावना में बहने की कोई आवश्यकता नहीं है। अपने प्रेमी को यह बताने के लिए कि आप उससे प्रेम करती हैं, शारीरिक संबंध बनाकर प्रमाण देने की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।

ऐसे संबंधों से आखिर किस तरह से उबरा जा सकता है? जहां तक हो सके इन संबंधों को अज्ञानतावश की गई भूल समझकर भुला देना ही जरूरी है। जीवन को पुराने ढर्रे से जितना जल्दी हो सके निकालने की कोशिश करना चाहिए। साथ ही किसी अच्छे काउंसलर से सलाह लेना भी उपयोगी होता है।